अंकिता जैन की कविताएँ (10 रचनाएँ)

10 Hindi Poems of अंकिता जैन

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एक आस / अंकिता जैन

एक आस / अंकिता जैन
एक आस / अंकिता जैन

बारिश की आस में जीती है वो
रोज़, थोड़ा-थोड़ा
मरती भी है
साँसें अटकाए रहती है हलक में कहीं
धड़कनें लटका लेती है
पत्तों के कोनों पर
जो चाहती हैं टपकना
और मिट्टी में मिल जाना,
जो जलती हैं दिनभर
और पसीजती हैं
फिर भी उसकी आस थामे
डटी रहती हैं
पत्तों के उन कोनों पर जिनमें फिसलन है
जिनमें उदासी की काई है,
नाउम्मीदी का दलदल बिछा है नीचे कहीं,
मगर फिर भी डूबती नहीं
न सूखती, न मरती
बस एक उम्मीद में चिपकाए रखती है
अपने अस्थि-पंजर उस ठूँठ से
जो सूख चुका है सालों पहले
मर चुका है जिसमें प्रेम और जीवन भी
उसमें जीवन की उम्मीद लिए
साधे रहती है उसे
उसके पौरुष को,
उसके निर्मोही "मैं" को,
और
बखूबी निभाती है अपने जीवन चरित्र
"प्रेम-बारिश" की आस में
"विष-बेल नारी" बनकर।

कहानी तेरी-मेरी / अंकिता जैन

कहानी तेरी-मेरी / अंकिता जैन
कहानी तेरी-मेरी / अंकिता जैन

मैं लिखती रहती हूँ
घर की दीवारों पर
कहानी तेरी-मेरी
जैसे किसी बड़े से मंदिर की दीवारों पर
गोदे जाते हैं
श्लोक
शास्त्र
और प्रार्थनाएँ
और तुम करते रहते हो अनदेखी
उन दीवारों पर लिखी
कहानी तेरी-मेरी
जैसे कई हज़ार श्रद्धालुओं से होते रहते हैं अनदेखे
वे सभी श्लोक
शास्त्र
और प्रार्थनाएँ,
उन्हीं श्रद्धालुओं से
जो करते हैं दावा भक्त होने का
सीना ठोककर
दान देकर
रतजगे कर
चौकियाँ बैठाकर
तीरथ जाकर
लेकिन फिर भी उन्हें लगते हैं आकर्षण भर
कोई सुंदर चित्रकारी हो जैसे
कोई रंगों की पहेली हो जैसे
या बस चीख़ते-पुकारते शब्द
जबकि हैं वो, उन्हीं के लिए लिखे गए
श्लोक
शास्त्र
और प्रार्थनाएँ
क्या तुम्हें भी दृष्टि-भ्रम है
या दिखाई ही नहीं देती
घर की दीवारों पर
चाकू से गोदी गई
कहानी तेरी-मेरी।

काव्य मर गया हो जैसे / अंकिता जैन

काव्य मर गया हो जैसे / अंकिता जैन
काव्य मर गया हो जैसे / अंकिता जैन

अब काव्य मर गया है जैसे
भीतर मेरे कहीं
क्या प्रेम नहीं बचा
या अहसासों की राख़ बन गई है
कितना कुछ था जीने को
जो तिल-तिल कर जलता रहा
हर दिन थोड़ा मर जाता
हर रात सिसकता रहा
कभी उम्मीद टूटी
कभी आस
कभी विश्वास टूटा
तो कभी पा जाने की प्यास
कभी दूर तक चली गई
कभी लौटी मैं घर को
पर कुछ कह न सकी
बिस्तर तकिया सब ख़ाली थे
कहीं हमारे तिनके भी बिखरे न थे
उन रातों को ढँक दिया था अमावस ने
जिनमें हम तुम जगते थे
जी भर उड़ेला था सब कुछ जहाँ
वहाँ अब सन्नाटे थे
इन सन्नाटों में कोई गुंजन फिर हो भला कैसे
अब भीतर कहीं मेरे
काव्य मर गया है जैसे

कौन हैं ये स्त्रियाँ / अंकिता जैन

कौन हैं ये स्त्रियाँ / अंकिता जैन
कौन हैं ये स्त्रियाँ / अंकिता जैन

स्त्रियाँ,
जो पढ़ना चाहती हैं राजनीति
और अर्थशास्त्र भी
मगर सिमट जाती हैं
सुशील मसालों से पेट,
सुंदर आलेपों से तन,
और सभ्य आचरण से घरों को भरने की किताबों में,
स्त्रियाँ,
जो बनना चाहती हैं सोलो-ट्रैवलर
या महज़ टूरिस्ट भी
मगर सिमट जाती हैं
सासरे से मायके तक की रेल में
और छुट्टियों में, जो मिलती हैं
बतौर रिश्तेदारों या फैमिली वेकेशन्स के नाम पर,
स्त्रियाँ,
जो बोलना चाहती हैं
हर मज़हबी-ग़ैर मज़हबी लड़ाई,
और दंगे-फसादों पर भी
उठाना चाहती हैं सवाल संस्कारों और धर्म ग्रंथों पर,
मगर सिमट जाती हैं
छठ, करवाचौथ और वट वृक्षों से लिपटी लाल डोरियों में,
स्त्रियाँ,
जो लेना चाहती हैं अवकाश
सिर्फ सोचने, समझने और लिखने के लिए
जीना चाहती हैं उस एकांत को
जिसे महज़ पढ़ती हैं काल्पनिक किताबों में,
मगर सिमट जाती हैं,
माहवारी की छुआ-छूत
पूजाघर और रसोई की देहरी
कमरे में पति से अलग बिस्तर
और बर्तनों पर लपेटी जा रही राख तक,
स्त्रियाँ,
जो मिटाना चाहती हैं
अपने माथे पर लिखी मूर्खता,
किताबों में उनके नाम दर्ज चुटकुलों,
और इस चलन को भी जो कहता है,
"यह तुम्हारे मतलब की बात नहीं"
मगर सिमट जाती हैं
मिटाने में
कपड़ों पर लगे दाग,
चेहरों पर लगे दाग,
और चुनरी में लगे दागों को,
स्त्रियाँ,
जो होना चाहती हैं खड़ी
चौपालों, पान ठेलों और चाय की गुमटियों पर
करना चाहती हैं बहसें
और निकालना चाहती हैं निष्कर्ष
मगर सिमट जाती हैं
निकालने में
लाली-लिपस्टिक-कपड़ों और ज़ेवरों के दोष,
कौन हैं ये स्त्रियाँ?
क्या ये सदियों से ऐसी ही थीं?
या बना दी गईं?
अगर बना दी गईं तो बदलेंगी कैसे?
बदलेंगी... मगर सिर्फ तब
जब वे ख़ुद चाहेंगी बदलना
सिमटना छोड़कर।

क्या देखा है तुमने कभी / अंकिता जैन

क्या देखा है तुमने कभी / अंकिता जैन
क्या देखा है तुमने कभी / अंकिता जैन

क्या देखा है तुमने कभी?
एक जोड़ा
उड़ता हुआ हवा में
भिगोते हुए पंख
करते हुए अठखेलियाँ
बहता हुआ लहर के साथ,
जो उठती है बिन मौसम,
युहीं कभी,
क्योंकि करता है मन उसका मचलने का
और बहा ले जाने का
संग अपने उन जोड़ों को
जो निकले हैं
बहने और मचलने

क्या देखा है तुमने कभी?
एक रूठा हुआ प्रेमी
बैठा है किसी डाल पर
इंतज़ार में प्रेमिका के
जो ला रही हो
उसका पसंदीदा दाना, चोंच में दबाए
लड़ते हुए उस तूफान से
जो निकला है मिटाने को घरौंदे
बिन अनुमान
युहीं कभी
क्योंकि करता है मन उसका तड़पने का
और उखाड़ देने का
उन सारे पेड़ों को
जिनकी टहनियों पर बैठे हैं
रूठे हुए प्रेमी

क्या देखा है तुमने कभी?
एक भटका हुआ बादल
जो बिछड़ गया है, अपनी माँ से
किसी मोड़ पर आसमान में,
जो चला था समंदर से
लेकर उसका गुस्सा
फट पड़ने कहीं,
बिन सावन
युहीं कभी
क्योंकि करता है मन उसका बरसने का
और डुबो देने का
धरती का हर एक कोना
जो छीन रहा है,
समंदर से उसकी जगह

नहीं देखे तो आओ
दिखाती हूँ तुम्हें
उस जोड़े को, उस प्रेमी को, और उस बादल को भी
तुम बन जाना वो प्रेमी, रूठा हुआ
बैठ जाना उस डाल पर
मैं लाऊंगी दाना तुम्हारे लिए
लड़ते हुए तूफान से
फिर डूब जाएंगे हम-तुम
उस बादल की बरसात में
धरती के किसी कोने पर
सिमटकर, लिपटकर एक दूजे में
घेरे बिना समंदर की कोई जगह
और बचा लेंगे ख़ुद को
देखने से
इस धरती की सबसे काली सुबह।

जब कोई पूछे तुमसे / अंकिता जैन

जब कोई पूछे तुमसे / अंकिता जैन
जब कोई पूछे तुमसे / अंकिता जैन

जब कोई पूछे तुमसे
कि कैसे हो
तो बता देना उस सिक्के के बारे में
जो पड़ा है तलहटी में
किसी पवित्र नदी की
किसी दुआ के भार में
करता हुआ अनदेखा
अपनी जंग लगती देह को
और
भुला दिए गए अपने प्रति नेह को

जब कोई पूछे तुमसे
कि कैसे हो
तो सुना देना उस कौवे की कहानी
जिसे कहा जाता है मनहूस
उड़ा दिया जाता है छतों से
माना जाता है प्रतीक
बुराई का
और
जो भुलाता चला आ रहा है अनंत से
अपने साथ होता छल,
गिरा दिए जाते हैं जिसके अंडे
उसी के घर से
एक ऐसे समजात द्वारा
जिसके गीत माने जाते हैं कोई मीठी नज़्म
मगर जिनमें दबे हैं कहीं
उस कौवे के
ताज़े-हरे ज़ख्म

अगर कोई पूछे तुमसे
कि कैसे हो
तो दिखा देना उस आदमी को
किसी लोकल ट्रेन, किसी चौराहे, या किसी बाज़ार में
बेचते हुए दुआएँ
और
छुपाते हुए अपना असल
नपुंसकता की खोल में
जिसे लील गई लाचारी,
भूख, या माँ-बाप की बीमारी
और जो पी गया घूंट में मिलाकर
अपने पौरुष को
किसी कड़वे घोल में

जब कोई पूछे तुमसे
कि कैसे हो
तो मुस्कुरा देना
क्योंकि पूछने वाले इंसान नहीं
खोलियाँ हैं
एक बड़े शहर की झुग्गी बस्तियों में
अप्रवासी घास सी उगी
खरपतवार हैं
जिन्हें अपने हालातों पर
अपनी बेबसी पर
अपनी गरीबी
और लाचारी पर
हँसना और रोना एक सा लगता है,
और जिन्हें अपने सवाल "कैसे हो" पर
मिला आपका जवाब
उस हँसने और रोने के बीच का लगता है।

भूख / अंकिता जैन

भूख / अंकिता जैन
भूख / अंकिता जैन

बच्चा
पहचान लेता है अंधेरे में भी
दूध से भरी छातियाँ
और हम
बड़े होते हुए भी
नहीं पहचान पाते
अपनी भूख
कि ये पेट की है
या स्वार्थ की,
मन की है
या शरीर की,
इच्छाओं की है,
या बदले की,
और तड़पते रहते हैं
ताउम्र
उसी भूख की तड़प से
उसे
अलग-अलग नामो से पुकारते हुए
ओढ़े रहते हैं चादर
समझदारी की
और भीतर दुपकाए रखते हैं
अपनी मूर्खता
जो रोकती रहती है हमें
पहचानने से हमारी भूख

मेरा झूठ / अंकिता जैन

मेरा झूठ / अंकिता जैन
मेरा झूठ / अंकिता जैन

झूठ जो जिया है मैंने
सालों साल
पैदा होते ही
कि मैं प्यारी बेटी हूँ
नहीं हूँ मगर
क्योंकि प्यारे तो बेटे होते हैं
कि चाँद आएगा किसी रात
मुट्ठी में मेरी
नहीं आएगा मगर
क्योंकि मुट्ठी में आते हैं
सिर्फ बेंत के निशान
जो मारे हैं किस्मत ने
जिसके निशान रहेंगे
चिता पर जल ना जाए वो मुट्ठी जब तक
कि गहना है इज़्ज़त मेरी
जिसे लूटा
बार-बार
उसने, तुमने, और किसी ने
लुटने पर जिसके फूटे फब्बारे
दिल के भीतर
चीखों के,
दर्द के,
बरसा जो कई बार आँखों से
आग बनकर,
तपिश में जिसकी जलती रही मैं
और पकता रहा वो गहना
होता रहा सुंदर, सुघड़, मजबूत
कि सब ठीक हो जाएगा
जब देहरी बदलेगी
बदलेगा
जब हवा पानी
सूरज सजेगा माथे पर
बिछेंगे तारे पैरों में
भरेगा आँचल जब
तब भूल जाना उन चीखों को
जो निकलीं थी खोदकर तुम्हें
खून से लथपथ
खुशी के साथ
हर बार ऐसी ही निकलती है
खुशी तुम्हारी
सच बनकर
झूठ, वो महज़ भ्रम है
उसे ओढादो आँचल
चिपकालो छाती से
और ठूँस दो कुछ बूँदें
सच की
उसके मुँह में जो
हर बार मचल उठता है
माहवारी के किसी दर्द की तरह
कोख में तुम्हारी
बार-बार
हर बार।

सूख गईं वो नदियाँ क्यों? / अंकिता जैन

सूख गईं वो नदियाँ क्यों? / अंकिता जैन
सूख गईं वो नदियाँ क्यों? / अंकिता जैन

नदियाँ, जो सूख गईं सदा के लिए
वे इसलिए नहीं
कि गर्मी लील गई उन्हें
बल्कि इसलिए
कि हो गया उनका मोह भंग
बहाव से
कि क्या करेंगी बहकर
उस गंदगी के साथ जो रास्ते में बैठी है
धाक जमाए
पैर फैलाए
जो लील जाती है उनकी निर्मलता
उनका पाक शुद्ध चरित्र
और उनकी कोमलता भी
जो बना देती है उनको दूषित
कसैला और कड़वा
वो नहीं जीना चाहती जीवन
मैली होकर
बस इसलिए
डूब गई हैं विरक्ति में
और सूख गई हैं उस मोह में
जो है उन्हें, अपने सच्चे अस्तित्व से,
क्या कोई फ़र्क है?
इन नदियों और उन स्त्रियों में
जो अपने अस्तित्व के मोह में
चुन लेती हैं विरक्ति
या आत्म-मुक्ति॥

सोने का पिंजरा / अंकिता जैन

सोने का पिंजरा / अंकिता जैन
सोने का पिंजरा / अंकिता जैन

एक मैदान है
कुछ गज का
इतना कि कदम भर नाप सकें उसे
एक कमरा है
कुछ फिट का
इतना कि नज़रें भांप सकें उसे
नज़रें जिनमें होते थे प्रतिबिंबित कभी
भीड़ में चमकते सर
दौड़ते-भागते पैर
चीखता-चिल्लाता शोर
सपनों से भरी आँखें
उम्मीदों को ढोते कंधे
प्रेम में जकड़ी हथेलियाँ
ख्वाहिशों में उलझे आलिंगन
दूरियाँ मिटाते चुंबन
रंगों से भरपूर सुबहें
उजालों से तरबतर शामें
और कुछ हसरतों को हक़ीक़त में बदलते दिन
मगर
अब इन आँखों में झलकती हैं
दो जोड़ी बेरंग दीवारें
सपनों को कैद किए अलमारियाँ
उम्मीदों को डुबोती बाल्टियाँ
आवाज़ को छुपाते परदे
चीखों को दबाते बर्तन
आँसुओं को झुठलाती छोंकन,
बेतरतीब भागती "इच्छाएँ"
उसी मैदान में
जिसे नापा जा सकता है
कदम भर
जिसमें जीती हैं
महीनों सड़-सड़ कर
उँगली में बांध किसी रबड़ से
जिन्हें फेंका जाता है दूर
आज़ाद हो कहकर
मगर लौट आना ही जिसकी नियति है
उसी उँगली पर
वापस
उसी मैदान और उसी कमरे में
जिन्हें नापा जा सकता है
जो कैद हैं सीमाओं में
और जिन्हें बनाया गया है
ऐसे आज़ाद परिदों के लिए
जो खरीदे जाते रहे हैं
सदियों से
उनके लिए जो बिताने आते हैं रातें
इन कमरों और मैदानों में,
और जिनकी
नस्लों को पैदा करने और पोसने के लिए
काट दिए जाते हैं
इन परिदों के पर।

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