अंकिता पुरोहित की कविताएँ (5 रचनाएँ)

5 Hindi Poems of अंकिता पुरोहित

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चिड़कली /अंकिता पुरोहित

चिड़कली /अंकिता पुरोहित
चिड़कली /अंकिता पुरोहित

एक डाळी सूं
दूजी डाळी
भच्च कूदै चिड़कली
पकड़ै अर मारै फिड़कली।
 
आभै उडै
उतरै
काची डाळी
डरै नीं
डाळी रै तूटण सूं
उणनैं रैवै
पूरो विस्वास
आपरी आंख माथै
पांख माथै।
 
उडणो सिखावै मां
आंख-पांख
देन विधना री
पण
हूंस पाळै
खुद चिड़कली
उडै खुद, मारै फिड़कली
हूंस पाण उडै चिड़कली!

दिवला अर बाट /अंकिता पुरोहित

दिवला अर बाट /अंकिता पुरोहित
दिवला अर बाट /अंकिता पुरोहित

छोरा
घर रा
दिवला होवै
तो छोरियां
होवै बाट
दोन्यां नै राख्यां बराबर
सैंचण होवै घर
फेर पसरै ठाट ई ठाट!
 
च्यानणो दिवलो करै
लोगड़ा भरमै क्यूं धरै
बिना बाट
कदैई नीं देख्यो
दिवलै नैं करता च्यानणो।
 
दिवलै अर बाट री
गाथा नैं समझणो पड़सी
दिवलै रै साथै
बाट नैं भी
अरथावणो पड़सी।

मां अर म्हैं /अंकिता पुरोहित

मां अर म्हैं /अंकिता पुरोहित
मां अर म्हैं /अंकिता पुरोहित

मां कद झलाया
सगळा बरत
ठाह नीं पण करूं
म्हैं नेम सूं,
बरत री कथावां
मां रै कंठां सूं निकळ’र
कद बसगी म्हारै कंठां
है ज्यूं री ज्यूं
ठाह ई नीं पड़ी!
 
जित्ता गीत
मां नैं आवै
बित्ता ई आवै म्हनैं
बियां ई जुड़ै जाड़ा
बियां ई दूखै माथो
बियां ई चालै पगां में रीळ
बियां ई जीमूं
सगळां रै जीम्यां पछै!
 
मां !
थूं कद बैठगी
ऊंडै आय’र म्हारै
है ज्यूं री ज्यूं?

म्हारा दादो जी / अंकिता पुरोहित

म्हारा दादो जी / अंकिता पुरोहित
म्हारा दादो जी / अंकिता पुरोहित

जद तक
दादो जी हा
घर में डर हो
दादो जी रै गेडियै रो।

गेडियै रो ज्यादा
पण दादोजी रो कम
डर लागतो म्हानै।

दादोजी
घर री
नान्ही मोटी जिन्सा
अर खबरां माथै
झीणी निजर राखता
बां री जूनी
मोतिया उतरयोड़ी
आख्यां सूं पड़तख
की नीं सूझतो
पण हीं यै री आंख सूं
सो कीं देखता
म्हारा दादो जी।

घर जित्ती ई
परबीती री चिंता
अखबार भोळावंतो
बा नै हरमेस
बै आखै दिन
चींतता घर आयां बिच्चै
जगती री चिंतावां नै।

अखबार समूळो बांचता
विज्ञापन तक टांचता
भूंडा विज्ञापन
फिल्मी पन्ना
हाथी नी लागण देंवता।

म्हां टाबरां रै
पढ च्यार पुड़द कर
राख लेंवता सिराणै निचै
जीमती बरियां
गऊ ग्रास राखण ताईं
की पान्ना देंवता दादी नै
जीमती बरियां
इयां ई करण सारू।

टाबरो पढल्यो दो आंक!
पढ्योड़ो सीख्योड़ो ई
काम आवै !
इण रट रै बिचाळै
खुद पढता ई
गया परा दूर म्हा सूं।
पण आज भी घर में
दादो जी री बातां रो डर है
डर है भोळावण रो!

आज भी म्हे टाबर
विज्ञापन अर फिल्मी पान्ना टाळ’र बांचां अखबार
कै बकसी दादो जी!

दादो जी कोनीं आज
फगत गेडियो है
एक कूंट धरियो
आज डर नीं है
गेडियै रो।

म्हैं हांसी ही /अंकिता पुरोहित

म्हैं हांसी ही /अंकिता पुरोहित
म्हैं हांसी ही /अंकिता पुरोहित

घर सूं गळी
गळी सूं गांव
गांव सूं ठाह नीं कठै-कठै
भंवै भाई
सिंझ्या
उण सूं पैली पूगै
गांव रा ओळमा
समूळो घर
ऊभो दीखै भाई साथै
भाई रै कूड़ माथै
न्हाखै धूड़
ओळमा बूरता!
 
म्हैं हांसी ही गळी में
फगत एक दिन
बांदर-बांदरी रो
खेल देखतां
जा पछै
बंद है
म्हारै घर री
बाखळ रो बारणो
अणमणा है
घर रा सगळा
उण दिन रै पछै!

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