अक्षय उपाध्याय की कविताएँ (22 रचनाएँ)

22 Hindi Poems of अक्षय उपाध्याय

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अगर सचमुच यह औरत / अक्षय उपाध्याय

अगर सचमुच यह औरत / अक्षय उपाध्याय
अगर सचमुच यह औरत / अक्षय उपाध्याय

अगर सचमुच यह औरत
इस साप्ताहिक के पन्ने से बाहर निकल आए
अगर सचमुच यह औरत
गरदन पकड़ कर चिल्लाए
तो क्या मैं सच कहूँगा ?

अगर सचमुच इस औरत के
स्तन पूरे मुखपृष्ठ पर छा जाएँ और
मेरे एकान्त में गनगनाएँ
तो क्या मौं सुनूँगा ?

अकेले में, सचमुच के अकेले में
यह औरत
कैसा सुख देगी मुझे ?
बिस्तर से बाग़पत तक
इस औरत के शरीर पर रोयें की तरह खड़ा
आतंक
क्या सचमुच मेरा आतंक है ?

अगर सचमुच यह औरत
अख़बारों की इस दुनिया से बाहर निकल कर
पूछे मुझसे मेरे घर का पता
तो क्या मैं सच कहूँगा ?

आदमी की पाँत से बाहर खदेड़ी इस औरत के भीतर
किसका जानवर दिखता है ?

इस साप्ताहिक के पन्ने से बाहर निकल कर
अपने गर्भ के बारे में
राजनीति की भाषा से बाहर सवाल करे
तो क्या मैं सच कहूँगा ?

क्या सचमुच यह औरत
साप्ताहिक के पन्नों से कभी बाहर भी होगी ?

इषिता के लिए (एक)/ अक्षय उपाध्याय

इषिता के लिए (एक)/ अक्षय उपाध्याय
इषिता के लिए (एक)/ अक्षय उपाध्याय

ओ मेरी बच्ची
मेरी आत्मा
तुम कैसे बड़ी हो‍ओगी !

तुम ऐसे बड़ी होना जैसे घास बड़ी होती है
तुम ऐसे बढ़ना जैसे लता बढ़ा करती है
तुम्हारे लिए यहाँ देखने को बहुत कुछ होगा
तुम्हारे लिए यहाँ खाने को बहुत कुछ होगा

तुम्हारे स्वप्नों को सुन रहा हूँ
तुम्हारे भीतर चल रही बातचीत समझ रहा हूँ
तुम्हारे भीतर असंख्य वसंत करवट ले रहे हैं

तुम्हारे आने के पहले यहाँ बहुत कुछ घट गया
एक दूकान लूट ली गई
एक बच्चे की हत्या कर दी गई
          एक आज़ादी और मिली
          एक मंत्री विदेश चला गया
एक युवती ने अपने प्रेम को सही किया
एक लम्बा जुलूस अपनी माँग के साथ आगे निकल गया
          मैंने एक बेहद छोटी कविता लिखने की भूमिका बाँधी

मेरी बच्ची तुम बग़ीचे की तरह भली और भोली हो

यह अजनबी जगह नहीं है
हम तुम्हारे माँ-बाप
दोस्तों से भरी यह जगह
वर्षों हमने इसे तुम्हारे लिए ही लीप कर रखा है
इससे पहले भी तुम यहाँ अपनी
किलकारियों के साथ हमारे बीच रही हो

कितनी बार तुमने हमारे बीच अपना बेहद कच्चा
संगीत छेड़ा है
कितनी बार अपनी तुतलाती आवज़ में
दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत गीत गाया है

पहली बार हमारे रक्त ने धरती का ऋण अदा किया
पृथ्वी को जीवित और सुन्दर बनाए रखने के लिए
एक भोली माँ दी है।

मेरी बच्ची
तुम्हारी सारी टूटी गुड़ियों को
वापस ले आऊँगा
और बाज़ार के दिन
तुम्हारे खोए नूपूर को ख़रीद कर
फिर से तुम्हें दूँगा

सारे दिन हवा साँय-साँय करती हुई
गाएगी ।

आदमी के इस जंगल में
सारे दिन हवा चिल्लाती है
प्रेम-प्रेम

मेरी नन्ही गुड़िया
तुम उत्सव के समान हो

एक लड़की जब बड़ी होती है तो
पूरी पृथ्वी के लिए
बड़ी होती है
मेरी बच्ची
मैम एक पूरी पृथ्वी
तुम्हें दहेज में दूँगा।

इषिता के लिए (दो) / अक्षय उपाध्याय

इषिता के लिए (दो) / अक्षय उपाध्याय
इषिता के लिए (दो) / अक्षय उपाध्याय

हर घर में

ऐसी एक लड़की है
जो गाती है
बालों में रिबन लगाती
अपनी गुड़िया के लिए
दूल्हा रचाती
उसका भी नाम इषिता है
हर घर में

हर घर में

ऐसी एक लड़की है
जो बड़ी होती हुई ईख तोड़ती है
पिता के सीने से अपना क्चद नापती
माँ की कोख में मुँह छिपाकर
ज़ोरों से फूँकती और
गौने के बारे में विस्तार से पूछती है
हर घर में

हर घर में

ऐसी एक लड़की है
जिसकी माँग
पूरे घर में चिपचिपाती है
भविष्य
इच्छाएँ
खजूर-सी लम्बी हो लेती है
रज-रह कर
फ़्रॉक के भीतर ही अपनी उम्र छिपाती, अपना खेल रोक
हर घर में एक लड़की है

पर इन सबको सहेजता, समझता
अपनी नदी-सी बच्ची को दुलराता
एक पिता भी है
हर घर में

तुम्हारे पिता की तरह
हर घर में

हर घर में
दोनों हैं

इस मौसम में / अक्षय उपाध्याय

इस मौसम में / अक्षय उपाध्याय
इस मौसम में / अक्षय उपाध्याय

यह मौसम है फूलों का
और बग़ीचे में चलती हैं बन्दूकें

कहाँ हैं वे चिड़ियाएँ जो
घोंसलों के लिए खर लिए बदहवास भागती हैं
आसमान में !

यह मौसम है गाने क
और मेरे घर में भूख नाचती है
कहाँ हैं वे स्वर जो
आदमी को बड़ा करने के लिए अपना रक्त लिए
हवाओं में छटपटाते हैं !

यह मौसम है
बच्चों के लिए बड़े होने का
स्वप्न देखने का
और उनकी नींद में युद्ध शुरू होता है
कहाँ हैं वे बच्चे जो
लड़ रहे आदमी को उसके स्वप्नों के साथ
ज़मीन पर टिकाएँगे ।

मौसम के ख़िलाफ़ ऐसा क्यों होता है
यह जानने के लिए
कवि जब-जब मोर्चे पर
बहाल होता है
मार दिया जाता है
लेकिन
कभी नहीं मरती कविता
दर‍असल
वह सिर्फ़ अनुकूल मौसम की बहाली होती है

एक कवि के मरने का मतलब है
पृथ्वी पर असंख्य कविताओं का जन्म ।

गेंद (एक) / अक्षय उपाध्याय

गेंद (एक) / अक्षय उपाध्याय
गेंद (एक) / अक्षय उपाध्याय

रात में
माटी पर
गति को महसूस करती पड़ी है
गेंद ।

पृथ्वी के सीने पर
नाच कर
आँखें खोले तारों को अपलक निहारती
खेल की दुनिया रचती
पड़ी है
गेंद

बच्चे को खोजती
उसके नर्म पैरों की थकान सोखती

फिलहाल गेंद के स्वप्न में
बच्चा भी है
और मैदान भी

बच्चे को उसके गोल की तरफ़
ले जाने का व्यूह रचती
गेंद की दुनिया में
जीत की आकाँक्षा के साथ
बच्चा लपकता है

और इससे पहले कि वह पहली किक लगाए
गेंद
आकाश और पृथ्वी के बीच
बच्चे के लिए
सबसे सुन्दर गीत गाती
हवा में ऊपर उठती है ।

गेंद (दो) / अक्षय उपाध्याय

गेंद (दो) / अक्षय उपाध्याय
गेंद (दो) / अक्षय उपाध्याय

खिलाड़ियों की स्मृति के साथ
चुप, उदास
इस गेंद के पास
अपनी कौन सी दुनिया है

किन स्वप्नों के लिए जीवित वह गेंद
कौन सी कविता रचेगी

सीटी की मार के साथ
लथेरी गई
बिना जीत की ख़ुशी में
पिचकी इस गेंद का हक़
खिलाड़ियों की नींद में ग़ुम हो जाता है

मैदान के खाली होने पर
जाल समेटते माली ने
अंतिम बार देखा उसे और बुदबुदाते हुए कहा था
ससुरी गेंद यहीं पड़ी रह गई ।

गेंद के जीवन में
मृत्यु का यह पहला अवसर था ।

गेंद सोचती है पहली बार
अपनी ज़रूरी कार्यवाही के बारे में ।

चिड़िया (एक) / अक्षय उपाध्याय

चिड़िया (एक) / अक्षय उपाध्याय
चिड़िया (एक) / अक्षय उपाध्याय

चिड़िया कहाँ जाती है
आसमान में

कहाँ जाती है वह दाने के लिए
दाना कहाँ है

किसका है पूछता है चूजा

चिड़िया लौट आती है
चुपचाप

घोंसला किसका है
घोंसले में अण्डे कौन देगा
कौन पर निकालते हुए सेंकेगा अपनी संतानों को

पूछती है चिड़िया
वृक्ष ख़ामोश है

धाँय
धाँय, धाँय
क्या हुआ ! क्या हुआ !
कौन था ! कैसा धुआँ !

चिड़िया छटपटाती है

किसने मारा ?
क्या किया था नन्हीं चिड़िया ने ?

आवाज़, आवाज़ें
आदमी, भीड़
क़दम-ताल, तेज़ क़दम
क़दम-ताल

पूछता है बच्चा
मम्मी चिड़िया मर गई न
पापा का निशाना कितना ठीक है
चिड़िया मर गई न ?

सुनते हैं चूजे
एक-दूसरे को देखते
घोंसले में सिर छुपा कर बोलते हैं
भागो
आदमी
आदमी
भागो

चिड़िया (दो) / अक्षय उपाध्याय

चिड़िया (दो) / अक्षय उपाध्याय
चिड़िया (दो) / अक्षय उपाध्याय

वे नहीं जानते
कैसे छोटी चिड़िया बड़े पंखों से उड़ान भरती है
और आकाश में
एक कोलाहल पैदा करती है

चिड़िया जब भी
गीत गाते हुए लंबे सफ़र पर होती है
यो उसके साथ
पूरी पृथ्वी का शोर और प्रेम होता है
उसके नन्हें सपने होते हैं
और चोंच में दबी हमारी कथाएँ होती हैं

नन्ही चिड़िया के
डैनों से टकरा कर आकाश
जल की तरह
पृथ्वी के सीने पर उतरता है

तानाशाह जब ही आता है / अक्षय उपाध्याय

तानाशाह जब ही आता है / अक्षय उपाध्याय
तानाशाह जब ही आता है / अक्षय उपाध्याय

तानाशाह जब भी आता है
उसके साथ दुनिया की ख़ूबसूरत असंख्य चीज़ें होती हैं
वह उन्हें दिखाता है
जिनके पास सजाने के लिए कमरे हैं

वे दौड़ते हैं

तानाशाह जब भी आता है
उसके साथ धर्म और जाति और ईश्वर होता है
धर्मप्राण जनता और धर्म के कर्णधार

लपकते हैं

तानाशाह जब भी आता है
एक नई दुनिया के ब्लू-प्रिंट के साथ आता है
तर्कहीन काल्पनिक एक जगमगाती दुनिया
के बारे में वह
उन्हें सुनाता है
जो संकरी गली से तत्काल राजपथ पर
चलना चाहते हैं

वे कुलबुलाते हैं

तानाशाह जब भी आता है
उसके साथ समूचे बग़ीचे के फूल होते हैं
वह हाथ में बाग़ को उठाए रखता है
बुद्धि देने वालों को पुचकारता
कला हाँकने वालों को गुहारता है
कोमल-करुण-भद्रजन
रोमांचित होते भहराते हैं

तानाशाह जब भी आता है
उसके साथ केवल एक चपाती होती है
वह भूख का भ्रम पैदा करता है
और उसके विलास में
केवल भरे पेट उछलते हैं

तानाशाह चाहे जब और जैसे आए
तानाशाह जाता एक तरह ही है
और
तानाशाह जाता ज़रूर है

तुम नहीं मिलती तो भी / अक्षय उपाध्याय

तुम नहीं मिलती तो भी / अक्षय उपाध्याय
तुम नहीं मिलती तो भी / अक्षय उपाध्याय

तुम नहीं मिलती तो भी
मैं
नदी तक जाता
छूता उसके हृदय को
गाता
बचपन का कोई पुराना अधूरा गीत
तुम नहीं मिलती तो भी

तुम नहीं मिलती तो भी
पहाड़ के साथ घंटों बतियाता
वृक्षों का हाथ पकड़ ऊपर की ओर
उठना सीखता
बीस और इक्कीस की उमर की
कोई न भूलने वाली घटना को
स्मरण करता
कपड़े के जूते में सिहर कर पैर रखता
तुम नहीं मिलती तो भी

तुम नहीं मिलती तो भी
जितना भी मेरे पास पिता था
उतना भर बच्चा जनता ही
रचता ज़रूर एक आदमी का संसार
कुछ अदद काँटों के बीच एक बेहद
नाज़ुक कोई फूल भी खिलाता ही

बस एक बात अलग होती
एक दरवाज़ा होता कभी नहीं बंद होने वाला
एक क़ैद अँधेरे से लड़ती चिड़िया होती
तुम नहीं होती तो भी
मैं नदी तक जाता ही ।

धान रोपती स्त्री / अक्षय उपाध्याय

धान रोपती स्त्री / अक्षय उपाध्याय
धान रोपती स्त्री / अक्षय उपाध्याय

क्यों नहीं गाती तुम गीत हमारे
क्यों नहीं तुम गाती

बजता है संगीत तुम्हारे पूरे शरीर से
आँखें नाचती हैं
पृथ्वी का सबसे ख़ूबसूरत
नृत्य

फिर झील-सी आँखो में
सेवार क्यों नहीं उभरते

एक नहीं कई-कई हाथ सहेजते हैं तुम्हारी आत्मा को
एक नहीं
कई-कई हृदय केवल तुम्हारे लिए धड़कते हैं
क्यों नहीं फिर तुम्हारा सीना
फूल कर पहाड़ होता

प्रेम के माथे पर डूबी हुई
तुम
धूप में अपने बाल कब सुखाओगी
कब गाओगी हमारे गीत

धान रोपती
एक स्त्री
केवल स्त्री नहीं होती

तुम वसंत हो
पूरी पृथ्वी का
तुम स्वप्न हो
पूरी पृथ्वी का
तुम्हारी बाँहों में छटपटाते हैं हम और
सूखते हैं हमारे गीत
वसंत पीते हुए इस मौसम में
क्यों नहीं गाती तुम
क्यों नहीं तुम गाती गीत हमारे ?

नेता (एक) / अक्षय उपाध्याय

नेता (एक) / अक्षय उपाध्याय
नेता (एक) / अक्षय उपाध्याय

मसान से फैले प्रदेश में
मचान गाड़ नेता अब और
                    बेतुकी नहीं हाँक पा रहे

अब तो पिपरिया के, छोटके के पूछे गए
ककहरा सवालों के जवाब में भी
गाँधी टोपी
भकुआ की तरह बबूर की ओर मुँह किए
                           दाँत चियारती है

वे जो कल तक
शेरवानी की समझ से
बकलोल-से दीखने वाले लोग समझे जाते थे
आज
उन्हें अपनी गरदन पर महसूसते हुए
उनकी
सिर्फ़ आँखें ही नहीं फैलती बल्कि
दिल्ल सुन्न और दिमाग भी डोलता है

'ग़रीबी से फटी गाँड़ का माई-बाप
ससुरा केहू ना हौ' कहता हुआ
जब जोखना
लाठी भांजता
सरपंच की खाँची से
नून-तेल-लकड़ी उठा लाता
और जमा जाता है
दो धौल उनके झबरों को तो
क्या बुरा करता है?

क्यों नहीं बजती हैं दमकल की घंटियाँ
रामकली के पेट में लगी आग से !
यह उसे कौन बताएगा ?
'ई सब सुनके अबकि
फालिज मार गैं सार नेतवा कै'
कह ऊख पेरते हुए दद्दा
सहसा गंभीर हो जाते हैं और
दुआरे रोपे गए पेड़ को बड़े गहरे देखते
फिर लम्बी साँस लेकर
कोल्हू के नट में तारपीन चुआते
और बढ़ने वाली रफ़्तार के लिए ख़ुद को तैयार करते रहते हैं ।

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