अखिलेश्वर पांडेय की कविताएँ (19 रचनाएँ)

19 Hindi Poems of अखिलेश्वर पांडेय

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आशी के लिए दो कविताएँ / अखिलेश्वर पांडेय

आशी के लिए दो कविताएँ / अखिलेश्वर पांडेय
आशी के लिए दो कविताएँ / अखिलेश्वर पांडेय

एक

घर लौटता हूँ तो
उसे देखते ही
मुख पर आ जाती है मुस्कान
वह ममता की नर्च चादर ओढ़े
सो रही होती है
उसकी पलकों की नीरवता मेरी आहट पहचान जाते हैं
उसके होठों पर बिखर आती है मुस्कान

उसके चुंबन से उदित होता है उषाकाल
गो कि दूब पर चमह उठी हो ओस
वह इंद्रधनुष के रंगों से
बादलों पर करती है चित्रकारी
ज्यामितिय रूपाकारों में
नाचते ही रहते हैं उसके नैन
उसके बालों में हाथ डाल
पकड़ लेता हूँ खुद की परछाई को.

दो

कुछ बटनों की टक-टक हुई
स्क्रीन पर उभर आया... आशी
यह असाधारण था
क्योंकि, यह उन ऊंगलियों का कमाल था
जिसका उन्हें इल्म तक नहीं था

कम्प्यूटर उसके लिए नई वस्तु थी
मैं चकित था
मेरे सामने मेरी बेटी
जो अभी सिर्फ तीन साल की है
कम्प्यूटर पर अपना नाम लिख रही है

कभी इस उम्र में मेरी ऊंगलियाँ
सरकंडे से बनी कलम से जूझती थीं
पेंसिलें भी नहीं
स्याही भरे जाने वाले कलम से
दवात, कागज लेकर स्कूल जाना
ऊंगलियों का स्याही से पुत जाना

बगल में खड़े मेरे मित्र अजित ने कहा
भाई साहब, यह न्यू जेनरेशन है
हमारो दिमाग से तेज इनकी उंगलियाँ चलती हैं

इतनी सी गुजारिश / अखिलेश्वर पांडेय

इतनी सी गुजारिश / अखिलेश्वर पांडेय
इतनी सी गुजारिश / अखिलेश्वर पांडेय

मुझे गालिब न बनाओ
गाली न दो!
मैं बड़ा कद्र करता हूँ उनका
मैं तो उनकी सफेद दाढ़ी का
एक बाल जितना भी नहीं
उर्दू मेरी मौसी (हिन्दी माँ) जरूर है
पर ठीक से जान-पहचान नहीं अभी
शेरो-शायरी भाती है (आती नहीं)
गजल सुनकर
वाह-वाह कह सकता हूँ
सुना नहीं सकता
माफ करो यारों मुझे
मैं गुलजार भी नहीं हूँ
सुना बहुत है उनको
पढ़ा भी है काफी
पर मतला और कैफियत
मेरे समझ से बाहर है
निराला, प्रसाद, बच्चन, त्रिलोचन भी नहीं मैं
सक्सेना, धूमिल जैसी जमीन नहीं मेरी
मैं किसी की छवि बनना भी नहीं चाहता
किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं मेरी
प्रेरक हैं सब मेरे
आदरणीय हैं सब
पर उनके दिखाये रास्ते पर चलकर
मैं अपनी मंजिल नहीं पा सकता
मुझे अपनी राह अलग बनानी है
आप मुझे साधारण समझ सकते हैं
पर दूसरों से अलग हूँ मैं
मैं नहीं चाहता किसी से संघर्ष
किसी को भयाक्रांत या
तनावग्रस्त करना
नीचे गिराना या कुचलना
करना जलील या ओछा देखना
मैं तो सबका मित्र बनना चाहता हूँ
मेरे पास जो थोड़ी सी दौलत है
उसे खर्च करना चाहता हूँ
लुटाना चाहता हूँ अपनी शब्द संपदा
इस बाजारी कहकहा में
नीलाम होना फितरत नहीं मेरी
मैं शब्दों का सुगंध फैलाना चाहता हूँ
विचारों को रोपित करना चाहता हूँ
आपके कोमल मन की धरालत पर
मैं अब भी इन बातों पर
विश्वास करता हूँ कि
हवा शुद्ध हो न हो
प्रेम अब भी सबसे शुद्ध है
हम अपनी मूर्खतापूर्ण इच्छाओं से
धोखा भले खा जाएं
खुद पर भरोसा हो तो
प्रेम में धोखा नहीं खा सकते
आप जानकर भले ही चकित न हों
पर सच यही है कि
धरती की शुद्ध हवा
इसलिए कम हो गयी क्योंकि
हमने प्रकृति से प्यार करना कम कर दिया
इसलिए मित्रों!
मैं कहता हूँ-
हवा को हम शुद्ध भले न बना पाएं
प्रेम तो शुद्ध करें
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे
सबकुछ सहज ही शुद्ध हो जाएगा
अगर शुद्ध होगा
हमारा अंतर्मन
हमारा वातावरण
हमारे विचार
हमारे कर्म
हमारे व्यवहार
तो बची कहां रह जायेगी
गंदगी!
मेरा मानना है-
किसी के पीछे दौड़ना छोड़ो
खुद से मुकाबला करो
खुद के ही बनो दुश्मन
और रक्षक भी
रोज मारो खुद को
रोज पैदा हो जाओ खुद ही
अहं का पहाड़ आखिर कब तक
खड़ा रह सकता है
खुद पर काबू पाना सबसे
आसान काम है और सबसे कठिन भी
यह जानते हैं सब
फिर आजमाने में हर्ज क्या है!

एक दिन / अखिलेश्वर पांडेय

एक दिन / अखिलेश्वर पांडेय
एक दिन / अखिलेश्वर पांडेय

मैं तुम्हारे शब्दों की उंगली पकड़ कर
चला जा रहा था बच्चे की तरह
इधर-उधर देखता
हंसता, खिलखिलाता
अचानक एक दिन
पता चला
तुम्हारे शब्द
तुम्हारे थे ही नहीं
अब मेरे लिए निश्चिंत होना असंभव था
और बड़ों की तरह
व्यवहार करना जरूरी

कविता / अखिलेश्वर पांडेय

कविता / अखिलेश्वर पांडेय
कविता / अखिलेश्वर पांडेय

कविता नहीं बना सकती किसी दलित को ब्राह्णण
कविता नहीं दिला सकती सूखे का मुआवजा
कविता नहीं बढ़ा सकती खेतों का पैदावार
कविता नहीं रोक सकती बढ़ती बेरोजगारी
कविता नहीं करा सकती किसी बेटी का ब्याह
कविता नहीं मिटा सकती अमीरी-गरीबी का भेद

कवियों!
तुम्हारी कविता
मिट्टी का माधो है...
जो सिर्फ दिखता अच्छा है
अंदर से है खोखला..!

कवियों!
तुम्हारी कविता
खोटा सिक्का है...
जो चल नहीं सकता
इस दुनिया के बाजार में..!

कालाधन / अखिलेश्वर पांडेय

कालाधन / अखिलेश्वर पांडेय
कालाधन / अखिलेश्वर पांडेय

रोटी हमारा पोषण करता है
रोटी देने वाले हमारा शोषण
चुल्हे की आग डराती है हर रोज
जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं
जलावन कहां से आयेगा?
'जनधन' खाता अब 'अनबन' हो गया है
संदेह की बिजली गरज रही
किसी ने बिना कहे-बताए
डाल दिए लाखों रुपये
पुलिस, बैंक, नेता, पड़ोसी
सब पूछ रहे मेरी कैफियत
क्या कहूँ मैं-
घरवाली के इलाज को एक पैसा नहीं
बिटिया के फटे कपड़ों से झांक रही लाचारी
माँ लड़ रही है टीबी से
कालाधन क्या होता है-
मुझे क्या मालूम!

डर पैदा करने की कला / अखिलेश्वर पांडेय

डर पैदा करने की कला / अखिलेश्वर पांडेय
डर पैदा करने की कला / अखिलेश्वर पांडेय

बड़ी-बड़ी रोबदार मूंछे
बेतरतीब बिखरे उलझे बाल
विचित्र वेशभूषा
भयानक भाव-भंगिमाएं
गजब की हरकतें
डरावनी आवाज
दूसरों को डराने के लिए
कुछ लोग क्या-क्या नहीं करते
इससे परे
कुछ कलाबाज ऐसे हैं-
जिनके 'भाइयों-बहनों' कहते ही
डर जाता है पूरा देश!

पराजित सच / अखिलेश्वर पांडेय

पराजित सच / अखिलेश्वर पांडेय
पराजित सच / अखिलेश्वर पांडेय

मैं अपने समय का पराजित सच हूँ
मैं एक जटिल कथा हूँ
सरल निष्कर्षों के आधार पर
लिखा नहीं जा सकता
इसका उपसंहार
दुखांतिका भी नहीं

आगजनी में जला दिए गए जिनके घर
दफ्तर से लौटते हुए
कत्ल कर दिए गए उनके पिता
वहां जली नहीं केवल एक बोगी
वह तो पूरा राष्ट्र था बल्कि
जो महीनों तक जलता रहा
मैं उन दंगों के बारे में क्या बताउं
उन कत्लों के बारे में भी

क्या उन दुखों की तेज आंधी में
फडफड़ाएगा कभी कोई पन्ना
बोलेगा कभी कोई शब्द
मैं तो चुप हूँ
चुप ही रहूँगा
मैं अपने समय का पराजित सच जो हूँ

भाषा का नट / अखिलेश्वर पांडेय

भाषा का नट / अखिलेश्वर पांडेय
भाषा का नट / अखिलेश्वर पांडेय

अखबारनवीस परेशान है-
अनर्गल के समुद्र में
गिर रही है वितर्क की नदियाँ
तलछट पर इधर-उधर
बिखरे पड़े हैं शब्द
प्रत्यय की टहनी पर बैठा है उल्लू
समास की शाख पर लटका है चमगादड़
कर्म की अवहेलना कर
बैठा है कुक्कुर
क्रिया वहीं खड़ी है चुचपाप
संज्ञा-सर्वनाम नंगे बदन
लेटे हैं रेत पर

हैरान है अखबारनवीस -
यह भाषा का कौन सा देश है
तभी अचानक
लोकप्रियता की रहस्यमयी धुन बजाते
अवतरित होता है
भाषा का नट
डुगडुगी बजाके
शुरू करता है तमाशा
सब दौड़े चले आते हैं
बनाके गोल घेरा
देख रहे अपलक
खेल रहा है भाषा का नट
उछाल रहा अक्षरों को
उपर-नीचे, दायें-बायें
तालियों से गूंज रहा चतुर्दिक
खुश है भाषा का नट

माँ की तस्वीर / अखिलेश्वर पांडेय

माँ की तस्वीर / अखिलेश्वर पांडेय
माँ की तस्वीर / अखिलेश्वर पांडेय

यह मेरी माँ की तस्वीर है
इसमें मैं भी हूँ
कुछ भी याद नहीं मुझे
कब खींची गयी थी यह तस्वीर
तब मैं छोटा था

बीस बरस गुजर गए
अब भी वैसी ही है तस्वीर
इस तस्वीर में गुड़िया-सी दिखती
छोटी बहन अब ससुराल चली गयी
माँ अभी तक बची है
टूटी-फूटी रेखाओं का घना जाल
और असीम भाव उसके चेहरे पर
गवाह हैं इस बात के
चिंताएं बढ़ी हैं उसकी

पिता ने भले ही किसी तरह धकेली हो जिंदगी
माँ खुशी चाहती रही सबकी
ढिबरी से जीवन अंधकार को दूर करती रही माँ
रखा एक एक का ख्याल
सिवाय खुद के

मैं नहीं जानता
क्या सोचती है माँ
वह अभी भी गांव में है
सिर्फ तस्वीर है मेरे पास
सोचता हूँ
माँ क्या सचमूच
तब इतनी सुंदर दिखती थी

मास्क वाले चेहरे / अखिलेश्वर पांडेय

मास्क वाले चेहरे / अखिलेश्वर पांडेय
मास्क वाले चेहरे / अखिलेश्वर पांडेय

मैं अक्सर निकल जाता हूँ भीड़भाड़ गलियों से
रोशनी से जगमग दुकाने मुझे परेशान करती हैं
मुङो परेशान करती है उन लोगों की बकबक
जो बोलना नहीं जानते

मै भीड़ नहीं बनना चाहता बाज़ार का
मैं ग्लैमर का चापलूस भी नहीं बनना चाहता
मुझे पसंद नहीं विस्फोटक ठहाके
मै दूर रहता हूँ पहले से तय फैसलों से

क्योंकि एकदिन गुजरा था मै भी लोगों के चहेते रास्ते से
और यह देखकर ठगा रह गया कि
मेरा पसंदीदा व्यक्ति बदल चूका था
बदल चुकी थी उसकी प्राथमिकताएं
उसका नजरिया, उसके शब्द
उसका लिबास भी

लौट आया मैं चुपचाप
भरे मन से निराश होकर
तभी से अकेला ही अच्छा लगता है
अच्छा लगता है दूर रहना ऐसे लोगों से
जिन्होंने अपना बदनुमा चेहरा छिपाने को
लगा रखा है सुंदर सा मास्क

मेरे विदेशी मित्र ने पूछा / अखिलेश्वर पांडेय

मेरे विदेशी मित्र ने पूछा / अखिलेश्वर पांडेय
मेरे विदेशी मित्र ने पूछा / अखिलेश्वर पांडेय

सुना है तुम्हारे देश में
रेल की छत पर भी बैठते हैं लोग
मैंने फिल्मों में देखा है...

क्या तुम्हारे यहां
अब भी लिखी जाती हैं चिट्ठियाँ
क्या अब भी कोई इनमें दिल बनाके भेजता है
क्या कबूतर ले जाता है इसको
इंडिया में लेटर बाक्स को
पेड़ पर लटके देखा हमने
बीबीसी न्यूज चैनल पर...

दुनिया में जब इतनी चीजें हैं खाने को
तुम लोग एक रोटी के ही पीछे क्यों भागते हो
चूल्हे की एक रोटी खाकर
मिट्टी के घड़े का पानी पीकर
तुम सभी अब तक जिंदा हो!

मैं कवि हूँ / अखिलेश्वर पांडेय

मैं कवि हूँ / अखिलेश्वर पांडेय
मैं कवि हूँ / अखिलेश्वर पांडेय

मैं कवि हूँ...
इसीलिए जानता हूँ
घाव कितना गहरा होता है

मैं कवि हूँ...
इसीलिए मानता हूँ
मुस्कान भले नकली हो
संवेदनाएं हमेशा असली होती हैं
इसी से सच्ची बात बोलता हूँ
झूठी मुस्कान नहीं बेचता

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