अखिलेश श्रीवास्तव की कविताएँ (19 रचनाएँ)

19 Hindi Poems of अखिलेश श्रीवास्तव

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जीवन / अखिलेश श्रीवास्तव

जीवन / अखिलेश श्रीवास्तव
जीवन / अखिलेश श्रीवास्तव

क्षण भंगुर है जीवन तो
शाश्वत क्या है
मृत्यु?
जिसकी एक भी स्मृति अपने पास नहीं!

माटी, अम्बर, जल, वायु, अग्नि
जिससे मिलकर बना है यह घट
जीवन उसी के विराट हो जाने की कहानी है!

माटी उपजाने लगे अन्न
और भरने लगे कई पेट
तुम्हारे भीतर के आकाश में उड़ान लेने लगे कुछ आश्रित पंछी
विष इतना चख लिया हो कि जल बदल जाये खारे समंदर में
उच्छवास से किसी की मद्धिम लौ-सी कोई उम्मींद
देखते ही देखते अग्नि शिखा हो जाये
तो अपनी पीठ ठोक लेना!

अपने शव से कहना कि
तू एक जिंदा आदमी की लाश है।
तुझमें जीवन और मृत्यु साथ-साथ नहीं रहे
तेरे लिये जीवन एक युग था और
मृत्यु एक क्षण।

ऐसा हुआ तो
तेरे भीतर की अग्नि को अग्नि बन जाने के लिए
घी की कोई ज़रूरत नहीं
तू लौटा सकेगा अम्बर को अम्बर
माटी को माटी!

बाकी ईश्वर पर छोड़ दे
वो रच सके तो रच ले फिर से
तुझ जैसा जीवन।

त्यागपत्र / अखिलेश श्रीवास्तव

त्यागपत्र / अखिलेश श्रीवास्तव
त्यागपत्र / अखिलेश श्रीवास्तव

मैं हर उस जगह से अनुपस्थित होना चाहता हूँ
जहाँ बंद खिड़कीयाँ चाहती है
कि मैं हवा हो जाऊँ!

तनी हुई भवो के बीच बहूँ
गर्म माथे से गुजरते हुए
उसे ठंडा रखूँ
उनकी नाक से गुजरते हुए
उन्हें जीवन दूँ
पर जब उच्छवास से बाहर निकलूँ
तो खुद को
कोयले की राख में बदला हुआ पाऊँ!
जब पूँछू
खुद के राख हो जाने की कहानी
तो कहा जाये कि
तुम शुरू से ही कोयला थे
बहुत होगा तो फानूस रहे होगें!
 
मैं फिर-फिर छानता हूँ खुद को
बहुत मुश्किल से बन पाता हूँ
इतनी-सी हवा
कि खुद सांस ले सकूँ!
पर कोई अनुभवी व
घाघ हो चुकी नाक
पहचान ही लेती है मुझे
मैं घाघ नाकों की जीभ पर
रखा हुआ भोजन हूँ!
 
हवा से राख बनते-बनते
इतना आजिज आ चुका हूँ
कि सोचता हूँ त्यागपत्र दे कर
पानी बन जाऊँ
सिर्फ एक बार पिया जा सकूँ
और गटर कर दिया जाऊँ!

दाएँ- बाएँ / अखिलेश श्रीवास्तव

दाएँ- बाएँ / अखिलेश श्रीवास्तव
दाएँ- बाएँ / अखिलेश श्रीवास्तव

संसद दाईं तरफ है
7 RCR दाईं तरफ है
नीति आयोग दाईं तरफ है
यहाँ तक कि साहित्य अकादमी
दाईं तरफ है
और सर्वोच्च न्यायालय भी!
 
वो खींच लेना चाहते है
सारी जमीन, सारी नदियाँ, सारा जंगल दाहिनी तरफ ही!
 हमसे कहा जा रहा है
आप सभ्य नागरिक हैं
नियमो का पालन
मुस्तैदी से करे
हमेशा बायें तरफ चलें!
मै इस स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य में
कुत्ता बनना चाहता हूँ
जो यूँ ही चलते-चलते
बेधड़क घुसता है कहीं भी
बिना खदेड़े जाने का खौफ लिए!

नव वर्ष / अखिलेश श्रीवास्तव

नव वर्ष / अखिलेश श्रीवास्तव
नव वर्ष / अखिलेश श्रीवास्तव

नव वर्ष छुएँ आपको

जैसे पहली ओस ने छुआँ हो पाँखुरी को
पसीने से तर शरीर को छूती है
नदियाँ किनारे बाग से चलती हवा।

जैसे चाँद से चेहरे को
अम्मा के काज़ल ने छुआ हो
डिठौंना बनकर
जैसे हुलस कर आशीष में उठे पिता के हाथ
छूँ लेते हैं पूरे शरीर को
भले ही हमनें आधा झुककर छुएँ हो पाँव।
जैसे प्रार्थना के मंत्र छूतें हैं अवसादित मन pको
प्यासे, थके पथिक को छूँ लेता है
निर्जन सरोवर का जल।

या फिर ऐसे
जैसे बिस्मिल्ला ने छूँई हो शहनाई.

ऐसे बिल्कुल न छुए
जैसे नमक की बड़ी-सी डली छूती है
नवजात बिटियाँ के
कंठ, जिह्वा, तालू, श्वांस नली को
सवार हो जाती है नन्हीं-सी चीख पर
उसके शांत हो जाने तक।

पहर / अखिलेश श्रीवास्तव

पहर / अखिलेश श्रीवास्तव
पहर / अखिलेश श्रीवास्तव

रात्रि के तीसरे पहर में
उसके लटों से खेलना
मेरे लिये आग तापनें जैसा है
उसके लिये है राख हो जाने जैसा।

उसका प्रेम उर्ध्वाकार होकर
यज्ञ की अग्नि बनना चाहता है
जबकि मेरा प्रेम चाहता है
क्षैतिज हो जाना।

वह माँ हो जाना चाहती है
पर कुंती होना नहीं।
मै आमादा हूँ सूर्य बन जाने को
पर पिता होना नहीं चाहता।

माँ और पिता का सम्बध
एक प्रयोग है कई बार
जिसमें पीठ सहलाते हुए दी जाती है
लड़कीयों को माँ बन जाने की सलाह
जबकि पिता होने व बन जाने के बीच
एक स्वीकृत ज़रूरी है
यह सुश्रुत का देश है
रूह व अजन्मे मांस को यूं अलग करता है
कि माँ तक को खबर नहीं होती।

शल्य चिकित्सा
कोख में अवैध खनन जैसा है
घोषणा पत्र पर पिता के हस्ताक्षर है
किसी ठेकेदार के हस्ताक्षर जैसे
अजन्मा शिशु बालू जैसा है।

दुनिया में
स्त्री के माँ बन जाने की संख्या
पुरूष के पिता बन जाने की संख्या से
कई गुना ज़्यादा है।

पेंग्विन / अखिलेश श्रीवास्तव

पेंग्विन / अखिलेश श्रीवास्तव
पेंग्विन / अखिलेश श्रीवास्तव

जब छोटा था और
सीख रहा था चलना
तो पंजे रखते ही भुरभुरी बर्फ
घुटने तक समा जाती थे
मैने गदेली भर पत्थर भी नहीं देखा
जहाँ बर्फ न हो।

मेरे पुरखे जो सुनाते थे
प्रलय की कहानियाँ
सिर्फ उसमें होती थी
बर्फ के गल जाने की खबर
हम सारे झबरीले पेग्विनों के बाल
झड़ जाते थे कहानियों में
और नहीं होती थी
एक भी मछली बर्फ की तलहट में
सफेद पहाड़ बदलने लगतेहहहब थे
शैतानी काले रंग में

अब जब मैं बूढ़ा रहा हूँ
तो एक-एक लक्षण दि हखते है प्रलय के
मैं भी सुनाना चाहता हूँ वही कीओशओकहानियाँ
पर अब बच्चे इसे नियति नहीं परिणित मानते है
तर्क गढ़ते है और पारिस्थितिकी के प्रश्न पूछते है पूरी दुनिया से

वो ऊलावों से पूछते है
शेरों से पूछते है और
पूछते हैं घड़ियालो से
किसी ने नहीं उज़ाड़े वन

तो फिर कौन काट रहा है करोड़ो दरख्त
पूरी धरती सुलग रही है अलाव बनकर
कौन ताप रहा है इसे
कौन किस्सों पर ताली ठोक रहा है
कौन कहकहे लगा रहा है

अलाव के एक उड़ते चिनगारी ने
पकड़ ली है घर में बिछी बर्फ की चादर
फर्श चटक रही है जगह-जगह से
पैर रखता हूँ तो सीधे चट्टान पर पड़ते है पंजे
मुझे घर की नंगी नींव दिखाई दे रही है
और अपनी कब्र भी!

प्रजा और पूँजी / अखिलेश श्रीवास्तव

प्रजा और पूँजी / अखिलेश श्रीवास्तव
प्रजा और पूँजी / अखिलेश श्रीवास्तव

पूंजीवादियो की सेनायें सामने थी
उनके रथियों के पास
गेहूँ के बीजो से लेकर
चिता के चइला तक
सब कुछ दमकती पन्नियों में पैक था!

प्रजा निहत्थी थीं
उन्होंने जबरन खुलवाई मुट्ठीयाँ
जिन हाथों में दमडिया नहीं थी
वो काट दिये गये!

धडाधड कटते बाजूओ के बीच
विपन्नो ने मैदान छोड़ दिया
कुछ ने कुँओं की शरण ली
कुछ ने पेड़ों के टहनियों की!
मैं शरणागत हुआ
संधिपत्र पर किये हस्ताक्षर
अपने गेहूँ के खेत उन्हें बेच कर
खरीद लिया गेहूँ का एक पैकेट!

खरीद फरोख्त में शामिल न होता
तो बीच बाजार
बाजार के हाथों मारा जाता!

अब मैं उनकी सेना में शामिल
पैदल मोहरा हूँ
अपने ही बंधुओं की बाजू काटता हूँ!

प्रेम / अखिलेश श्रीवास्तव

प्रेम / अखिलेश श्रीवास्तव
प्रेम / अखिलेश श्रीवास्तव

आओ मिल कर खोजें प्यार
लुप्त प्रजातियों की भाँति
चाहो तो पूछ लो
अरगनी पर टँगे चाँद से
या फिर डाल दो
इक मेल मंगल को!

परिंदों,
किसी खुली खिड़की से घुस जाओ
आसमान के घर में
या फिर
डाल्फिन से कहो
खोजे समुंदर के तलहट में
हो सकता है
टाइटॅनिक के नीचे दबा हो प्यार!
 
वर्तमान और निकट भविष्य में भी
प्रेम इतना दुर्लभ है
कि आओ सब मिल कर
प्रेम को परमात्मा मान लेते हैं!
 
हम दोनो को
खोजते रहना चाहते हैं
पाना नही!
 
अभी खबर आयी है
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से
पाए गये है दो लोग प्यार करते हुए
एक को गोली मारी गयी
दूसरे को काटा गया गडासे से
प्यार का खून पा
लहलहा गयी प्रधान की चुनावी फसल
पंच के फ़ैसले पर
उठा ले गये कुछ लोग
प्रेमी की बहन को खेत में
परमात्मा, प्रेम का हश्र देख
बिला गये है जाने कहाँ!
 
देख ले रे नकुला
जंघवा पर तिल।
हो हो हो
कै बरिस के होई
ए फ़ैसला त
पंचे करिहे।
खी खी खी
 
सारे गाँव वाले खिखिया कर हँस रहे थे
 पर खेत शर्मिंदगी झेल नहीं पाए
सूखा गयी सरसों
किरा गये धान
सारे पत्ते गिरा कर
नंगी औंधी पड़ी है अरहर
गाँव के बीचो बीच
लड़की की तरह!

बकैती / अखिलेश श्रीवास्तव

बकैती / अखिलेश श्रीवास्तव
बकैती / अखिलेश श्रीवास्तव

हर चर-अचर के भीतर
एक आत्मा होती है
और मेरे?
स्त्री-कंठ का प्रश्न था
तुम्हारी आत्मा तुम्हारी देह के बाहर है
चिड़िया की तरह बैठी रहती है काँधे पर
बिजूका के हिलने की आहट पाते ही
फुर्र से उड़ जाती है
जब तब यह बिजूका है तुम देह हो।
यह पानी पर लिखी एक किताब के
पहले पन्ने पर लिखा है औरत!

सारे जीव-जन्तुओं को समान अधिकार है
जीवित रहने का!
फिर झटके से मेरी गर्दन उड़ा देने का औचित्य?
जब खाल उतरनी ही है तो पहनाता क्यों हैं बचपन में
मेरे जीवन का अधिकार लंबित है सदियों से
गर्दन बचाते हुये जिबहबेला में मेमिआते
एक अनपढ बकरे के जिरह को ख़ारिज किया
एक आसमानी किताब के बीच के पन्ने ने!

सब पदार्थ एक ही परम पिता के रचे हुए हैं
तो फिर चंदन माथे पर क्यों है
और मैं ख़ुश्बू के बावजूद पाँव में क्यों?
इस गुस्ताख प्रश्न पर ही कई फूलों की गंध
छीन ली गई
यह वाकया दर्ज है
उस किताब के आखिरी पन्ने पर
जिसके हर्फ़ हवा में उभरे थे!

इतने युगों से बरस रहा है पानी
धरती तक ठंडीे हो चली
पर इन किताबों में आग धधक रही है अब तक
खुलते ही जला देते हैं दो-चार घर!

इस उमस भरे मौसम में
मुझे उम्मीद बस दीमकों से है
वो चट कर जाये हर उस किताब का पन्ना पन्ना
जहाँ ईश्वर बैठा-बैठा
बकैती करता रहता है!

बहन / अखिलेश श्रीवास्तव

बहन / अखिलेश श्रीवास्तव
बहन / अखिलेश श्रीवास्तव

1)

जिस भोर बहन जन्मी घर में
दादा ने माँ के पुरखो को गालियाँ दी
दादी ने माँ के खानदान को
पिता ने माँ को
औऱ बिलखती माँ ने खुद को
सांझ होते-होते
लपेट लिये गये ईश्वर भी।
फिर भी बहन ने संस्कार सीखे
औऱ मैंने गालियाँ!
 
2)

मैंने पहली बार सातवीं में प्रेम किया
दूसरी बार नौवीं मे
तीसरी बार गयारहवी मे
फिर काफी का कप बन गया प्रेम।
बहन ने सिर्फ़ एक बार किया प्रेम
सिर्फ एक बार लिया अपने ईश्वर का नाम
गला रेता गया रात के तीन बजे
तक जाकर सबेरे तक बच पायी इज्जत!

बिटियाकोखी औरतें / अखिलेश श्रीवास्तव

बिटियाकोखी औरतें / अखिलेश श्रीवास्तव
बिटियाकोखी औरतें / अखिलेश श्रीवास्तव

कभी सुना है तुमने
उस गवई स्त्री के ठहाके में दर्द का अट्टहास
जिसकी हकीकत में तीन बेटियाँ हो
और ख्वाब में हो एक बेटा।
बेटों वाली स्त्रियाँ
कभी स्वप्न में भी नहीं जान पायेगी
बिटियाकोखी स्त्रियों का दर्द।

वो हर बार पूजा बढ़ा देती है
पर हर बार पाती है बिटियाँ
अब वह ईश्वर के खिलाफ हो चली है
परम्पराओ के खिलाफ हो चली है
नहाती ही नहीं है नरक चतुर्दशी को
जब बेटा है ही नहीं
तो वैसे भी नहीं मिलना स्वर्ग
ये फालतू का मनुवादी आडम्बर क्यों
इस तरह के तर्को से वैज्ञानिक बन
खिसिआई हँसी हंसती हैं
फिर कहती है-कहीं नहीं है स्वर्ग-नरक
सब 'यहीं' है
उनके यहीं में
हहाकर-सी समाई रहती हैं उनकी बेटियाँ।

कोईरी बुआ सबसे
पावर फुल्की अल्ट्रा साउंड मशीन है गाँव की
हफ्ता बता देती है
चार कदम चाल देखकर
पेटवा बढिआया है गोवर्धन जैसा
जबकि पीठियाँ शांत है यमुना जैसी
पक्का होगा कन्हैंया।

एक पिपरा वाले बाबा भी है गाँव में
गर्भवती स्त्रियों के पेट पर
उभरी लकीर देखकर पढ़ते है
अजन्मे का लिंग
जो नाभि से उठती है
और जाती है बहुत नीचे तक।

पल्लू हटने पर
झट छिनाल कह देने वाली सास
खुद बहुरिया संग कुटिया में जाती है
टाट पर लिटा उघार देती है पेट
और बिना कहे बाहर निकल जाती है
बहुत महीन व धुंधला-सा
पर शायद वह जानती है
लकीर के फकीर होने का मतलब।

बाबा देखते है,
टटोलते है, बहुत पास से
सूंघते है नाभि
तौलते है लेटी स्त्री की विरोध चेतना
फिर बडबडाते हुए
रगड देते हैं वक्ष पर भभूत
जिसमें से स्त्री सुन पाती है
सिर्फ़ माया व मोहनी जैसे शब्द।
ये पहले प्रहार हैं
इसे सुनकर काठ मार जाता है
उस बहादुर स्त्री को भी
जिसने कल ही मारा था दालान में
निकला गेंहुवन।


इन शब्दों का विष
फैल रहा है स्त्री के शरीर में
वो नीली पड़ती जा रही है
उसके कोरो से बहते अश्रुबूदों में
अपनी अनामिका डुबो कर
घिसता है एक जड़ी, बनाता है लेप
फिर झुकता है लकीर पर
 बड़े नजदीक से पढता हैं लकीर की लिखावट
इस बार योग शक्ति से आंखे जीभ में निकल आई हैं
यह योग शक्ति छोटी बड़ी मात्रा में होती है
हर पुरुष के पास।

लेप नाभि पर गिराता है, फैलाता है
सूंघता है, चखता है, थूकता है
जड़ी के बहाने वह नाभि, पिंडली व कमर चाट रहा है
स्त्री देह का पूरा कटि प्रदेश
भर देता है अपने लार से
लगता है अजन्मा खुद पिघल कर नाभि से
बाहर आ रहा हो
वो लार ज्वालामुखी से निकले
लावे की तरह गर्म है।
अचानक कूदकर उठाता है कमंडल
स्त्री के मुँह पर छीटें मारकर
साफ करता हैं फेंन चिल्ला कर
पूछता है पहिल का था
पूतना कि कन्हैंया...
निश्चेत स्त्री के मुंह में एक भी शब्द नहीं है
बाबा ने धर दिया है कमंडल पर कपाल
हमारा सारा ज्ञान, सारा व्याकरण, सारे शब्दकोश, सारे कर्मकांड,
उसी कमंडल में बंद हो गये है
मनु अपने पूरे नाव सहित
उस कमंडल में तैर रहे है
कमंडल में कोई
प्रलय नहीं है।

शब्द उपजाने की कोशिश में
वो अपनी आँख लगी जीभ डाल देता है
स्त्री के मुँह में
लेता है पूरे मुँह की तलाशी
स्त्री के निचले होंठ से खून रिसने लगा है
पिपरा के पेड़ पर बैठें बरम खुश है
चढ़ावा चढ़ चुका है
स्त्री देह से सम्बंधित कोई भी पूजा
उसके रक्त यादाह के बिना पूरी नहीं होती।

पूरे कंठ प्रदेश में
एक भी शब्द न होने से
बाबा उग्र हो उठता है
अब जीभ छोड़ दांतो से काट लेता हैं
उसके कान
वहीं चिल्लाता है
पूतना कि कन्हैया...
ये शब्द इतने तीक्ष्ण व तीव्र है कि
निस्तेज
स्त्री का ह्रदय कांप जाता है
बिखरे, निढ़ाल, क्षत-विक्षत दो शब्द होंठो पर
धरती फैले खून को लांघते
हुए निकलते हैं
तीन ठे पूतना...
ये शब्द ईश्वर के न्यायालय से जारी
बाबा के विजय का आदेश पत्र है।
बाबा चुभला कर
खाता है इन शब्दों को
फिर खींच कर पीता है
होंठ से रिसता खून
इस भोजन में
वहीं तृप्ति है जो परास्त शत्रु के
सर पर पैर रखकर उसे कुचलनें से आती है
 दर्प से उसका चेहरा चमचमा रहा है
विजय भाव शरीर में लगातार नीचे उतर रहा है
शरीर की सारी शक्तियाँ मिलकर
उसके एक महत्त्वपूर्ण हिस्से को तनाव दे रही हैं।
बाबा को समाधि की राह दिखी है
वह स्त्री नाभि पर पहुँचता है
और उसी लकीर की पगडंडी पकड़े उतरता जाता हैं
 नीचे और बहुत नीचे तक
एक जगह पहुँच कर वह
स्त्री की देह उतार देता हैं
स्त्री अब सिर्फ़ आत्मा है।
समाधि की राह पर
सबसे पहले टकराता है
हिमालय के एक पठार से
चीड़ के घने जंगल है आस पास
कई जंगली फूलों की गंध है
अनगढ़ जड़ें है
वहाँ कोई आवाज नहीं है
न कोई सन्नाटा है
ये बात शब्दों के जन्म के बहुत पहले की है
बहुत ठंड है वहाँ
वहाँ हजारों साल से कोई सूरज नहीं उगा
वहाँ कोई रोशनी नहीं है
घुप्प अँधेरा है

स्त्री अब आत्मा नहीं है
स्त्री अब प्रकृति है।
पुरुष की जीभ आँख है
उसके दोनों कान आँख है
उसका पूरा चेहरा हजारों आँखों से भर गया हैं
वह उस घुप्प अंधेरे में भी खोज लेता
है वह खोह
जहाँ उसे योग मुद्रा लगाकर बैठना है।

 वह अपनी आंखों
 लगी नाक, जीभ घुसाता है भीतर
झांक कर देखता है
कहाँ बैठे है ब्रह्मा
कहाँ छुपा है उनका अमृत कलश
जो इस खोह से लगातार उपजता रहता है, जीवन
न जाने कितनी सदियों से।
पुरुष जानता है कि वह हजार जन्म भी ले ले
तो भी उसका पाप उसे इस खोह में घुसने नहीं देगा।
अब वह बनाता है
एक वासुकि
खोह में डालकर मथता है उसे
अमृत कलश की चाह में।
वासुकि के मुख
से अग्नि शिखा निकल रही है
ब्रह्मा ने अपना अमृत कलश
अपने वामांग मुख की दाढ़ में छुपा लिया है
ओम ओम का उच्चारण अब घोष में बदल रहा है
लगातार मंथन से एक धार निकलती है उस खोह से
स्त्री अब प्रकृति नहीं है
उसका एक उप समुच्चय हैं
स्त्री अब एक कथित जीवन धार है
स्त्री अब गंगा है।
पुरुष उस धार में खोज रहा है अमृत
पर उसमें गाद है
वासुकि का विष है
उसकी केंचुल है
गाद है बहुत सारा
और अमृत छटाक भर भी नहीं
 स्त्री अब गंगा नहीं है
 स्त्री अब मथ दी गई मांस का लोथा है
जिसमें न देह है न आत्मा है, न प्रकृति।

पिपरा बाबा का देह धरे पुरुष अब
समाधि की अंतिम अवस्था में है
उसकी जटायें खुल चुकी है
वो लगभग शव हो चुके स्त्री देह पर
तांडव कर रहा है
पर वह शिव नहीं है
उसकी तांडव मुद्रा उर्ध्वाकार न होकर क्षैतिज है
 वह खूब लम्बी साँसे भर रहा है
 लटपटाती, हाँफती आवाज में
खूब तेज चिल्ला रहा है
ओउ$म ओ$ $म
बाहर बैठी बुढिया
भींच लेती है दोनों हाथ
चढ़ा लेती है माथे पर
मनौती में बढ़ा रही है
रत्ती पर रत्ती
और ये अंतिम ओ$$$म है
बुढिया पहुँच चुकी है आठ रत्ती तक
अब यही चढावा चढेगा
पिपरा वाले बाबा को।
इस बार बात
चीत्कार से आगे की है
प्रकोप इतना बड़ा है कि
मर्द घर छोड़कर भाग खड़े हुए है
पर झींगुर वही है
कुत्ते भूख से कूक रहे है
कुओं ने अपनी ठंडाई चूल्हो को देकर
खुद आग पकड़ ली है
सिसकियो के बीच बस बकरियाँ है
जो हुलस कर मिमियाँ रही है जिब़ह होने के खौफ को विस्मृत किये हुए
बधाई हो, बिटिया हुई है।

माँ-1 / अखिलेश श्रीवास्तव

माँ-1 / अखिलेश श्रीवास्तव
माँ-1 / अखिलेश श्रीवास्तव

जब हम बच्चें थे
तो फूल मान लिये गये थे
रोज सबेरे क्याँरी सींची जाती थी

अरगनी पर चादर तान
दों टूक जवाब दे दिया जाता था सूरज को
बचा लियें जाते थे हर ताप से
पौधों के नींचे रख दिये जाते थे
दों धारीदार पत्थर
हमारे बहाने ही
पूजें जाते थे शिव
 
दुपहरियाँ में निराई गुड़ाई
करते पिता खुरपी जैसे कठोर हो जाते
और सांझ होते-होते
इतने नर्म जैसे कपास के फोहे हो
खूब सुख भरा था
फूल के हर पंखुड़ी में
जब भी माँ का ख्याल आया
एक मिठास तैर जाती मन में
कभी मनाती कभी पोहलाती माँ
एक मिठाई जैसी है

बहुत दिन बाद
जब फूल से फल बने
और फल से बीज़
तब तलाशनी शुरू की वह जमीन
जहाँ मुझे उगना था
देनी थी छाया।
क्याँरी में उगना
और किसी अनजान जमीन पर
अपनी जड़े जमा लेने का अंतर
या तो अमलतास की बेंलो को पता है
या मुझे।
 
पिता के अलावा
दुनिया के सारे रिश्ते
चीड़ के जंगलों जैसे हैं
और फैले हैं दूर-दूर तक
जीवन का सारा जल
खींच लिया हैं आस पास से
 
कई योजन तक
पठार ही पठार हैं
उनकी पत्तियाँ नुकीली और शंकुल हैं
बगल से गुज़र जाऊँ तो
पूरे शरीर पर खरोंच के निशान दिखते हैं
जैसे कई बाघो ने
एक साथ मारा हो पंजा

माँ उस जंगल
में कनेर जैसी है
जब भी कोई फांस लगी पांव में
उस पठार भरे चीड़ के जंगल से
गुजरते हुये
उसने अपनी पूरी शक्ति
जड़ो से खींचकर
फुनगिंयो तक पहुंचाई
अपने को कूटा, मसला
और ज़ख्मो पर छाप दिया
माँ मुरझा गई
एक दिन अपनी ही फुनगिंया तोड़ते-तोड़ते
मैं आज भी
चीड़ के जंगलो में कनेर ढूंढता हूँ।

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