अग्निशेखर की कविताएँ (72 रचनाएँ)

72 Hindi Poems of अग्निशेखर

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19 जनवरी 1990 की रात / अग्निशेखर

19 जनवरी 1990 की रात / अग्निशेखर
19 जनवरी 1990 की रात / अग्निशेखर

घाव की तरह
खुलती हैं मकानों की खिड़कियाँ
छायाओं की तरह झाँकते हैं चेहरे हर तरफ़
फैल रहा है बर्फ़ानी ठंड में शोर
हमारी हड्डीयों की सुरंग में घुसने को मचलता हुआ
गालियाँ, कोसने, धमकियाँ
कितना-कुछ सुन रहे हैं हम

तहख़ाने में कोयले की बोरियों के पीछे
छिपाई गई मेरी बहनें
पिता बिजली बुझाकर घूम रहे हैं
कमरे में यों ही
रोने-बिलखने लगे हैं मौहल्ले के बच्चे
होंठ और किवाड़
दोनों हैं ब्न्द
बाहर कोई भी निकले
शब्द या आदमी
दोनों को ख़तरा है

अभिशाप / अग्निशेखर

अभिशाप / अग्निशेखर
अभिशाप / अग्निशेखर

हमें मार नहीं सका पूरी तरह
कोई भी शस्त्र उनका

न जला ही सकी
हमें कोई आग

कोई भी सैलाब
डुबो नहीं सका हमें पूरी तरह

हमें उड़ा नहीं सकी हवा
सूखे पत्तों की तरह

हम मर गए
छटपटाती आत्मा की
अमरता के अभिशाप से यहाँ

अयप्पा पणिक्कर / अग्निशेखर

अयप्पा पणिक्कर / अग्निशेखर
अयप्पा पणिक्कर / अग्निशेखर

मैंने तुम्हे जिसके अनुवादों से जाना
वह कल फ़ोन पर रो रही थी
मेरी आत्मा की सीपियों में
भर गए है तुम्हारे गीत

तुम नही जानते हो
कवि की सीपियाँ
मोहताज नहीं होती स्वाति-नक्षत्र की

ओ खुरदुरे नारियल की तरह
भीतर से तरल कवि
मैंने तुम्हे तुम्हारी अनुवादक के आँसुओं में
साफ़ साफ़ देख लिया है
तुमने स्वयं भी बादलो के ऊपर से
किसी पंछी को उड़ते नहीं देखा होगा
पर मैंने तुम्हें देख लिया है
कल रात जब मै भीग रहा था
तुम्हारी अजानी स्मृतियों से
हालांकि 'दस बजे' शीर्षक से
तुम्हारी कविताओं में मैंने
पहले ही चीन्ह लिया था तुम्हें

पर यह जो तुम
अपनी तरह के 'कुरुक्षेत्र' के बीच छोड़
चल दिए उसे
बिना बताये
शायद नाराज़ होकर
शायद किसी संदेह में पड़कर
शायद टूटकर आखिरी पत्ते की तरह
शायद समय की विक्षिप्तता से तंग आकर

क्या कहूँ अयप्पा
पहुँचने नहीं देते हो किसी नतीजे पर
तुम्हारी स्मृति में बहाए आँसू
मुझे विकल किए है
दुनिया में अभी कितना कुछ बाकी है
जो तय नहीं है
जैसे अजनबी संबंधो के नाम
जैसे हर रात दस बजे फ़ोन पर पूछना -
कैसी हो ...
और रिसीवर रख देना मुखर मौन में

कविता और अनुवाद के बीच
शब्द और भाव के बीच
सुर और लय के बीच
जो चीज़े प्राय: छूट जाती हैं
उनका आँसुओं में ढलकर
मोतियों में बदलना
मैंने इससे पहले कभी नहीं जाना

अयप्पा
मै तुम्हारे इन बीजाक्षरों का क्या करूँ
अनुवाद से परे की दुनिया में
शायद अब तुम भी नहीं रहे
ठीक सुना कल रात मैंने फोन पर
'अब मै किससे बात करूँ...'

अयोध्या / अग्निशेखर

अयोध्या / अग्निशेखर
अयोध्या / अग्निशेखर

जीवित हो रहे हैं मुर्दे
अयोध्या का जाप करने वालों की
खुल रही हैं आँखें
चुकाया नहीं जा सकता है
मुर्दों का ऋण
अतीत खुजा रहा है पाँखें

धर्म
सिर पर नहीं
छतों पर चढ़कर अब बोलता है नगर में
प्रतिष्ठित हुई हैं ईंटें
देवताओं की तरह पूजित
मरी हुई ईंटें
इतिहास का वितरित हुआ प्रसाद

हे राम !
तुम कितनी त्रासदियाँ देखोगे

अलग-थलग / अग्निशेखर

अलग-थलग / अग्निशेखर
अलग-थलग / अग्निशेखर

एक-एक कर जला दिए गए हैं पुल
अरसा हो गया हमें
आर-पार बँटे हुए
बाहर-भीतर

हमारे सामने नदी में गिरकर
डूब गए है कुछ लोग
नदी का क्या बिगड़ता है
पुलों के होने न होने से

हम ही
पड़ गए हैं अलग-थलग
सदियों दूर
आमने-सामने

अलाव / अग्निशेखर

अलाव / अग्निशेखर
अलाव / अग्निशेखर

पहुँच गए थे हम
निबिड़ रात और बीहड़ अरण्य में
जलाया सघन देवदारों के नीचे
                    हमने अलाव
तप गया हमारा हौसला
सुबह होने तक रखा तुमने
मेरे सीने पर धीरे से
अपना सिर
स्मृतियों से भरा
विचारों से स्पंदित
और स्वप्न से मौलिक
भय और आशंकाओं के बीच
सुनी तुमने
मेरी धडकनों पर तैर रही
फूलो से भरी एक नाव
मेरे जीवन-लक्ष्य की तरफ जाती हुई
इस निबिड़ रात और बीहड़ अरण्य में
सूरज के उगने और पंछियों के कलरव के साथ
बदलने जा रहा था संसार
समय की सदियों पुरानी खाइयों
गुफ़ाओं में
उतरने वाली थी रौशनी

पेड़ के खोखले तनों में
हमें खेल-खेल में जा छिपना था कुछ देर
बातें करनी थीं अनकही
और मन किया तो करना था प्यार भी
नैसर्गिक
फ़िलहाल
सुबह का इंतज़ार था
और मै अपने सीने पर
महसूस रहा था तुम्हारी साँसें
तुम्हारी नींद
                 और हाथ तुम्हारा

शायद
इस निबिड़ रात और बीहड़ अरण्य में
हम बचा रहे थे इस तरह
अपनी स्मृतियाँ
विचार अपने
और स्वपन भी

हमने बुझने नही दिया अलाव

अस्थियाँ / अग्निशेखर

अस्थियाँ / अग्निशेखर
अस्थियाँ / अग्निशेखर

ओ पुरातत्त्ववेत्ता भविष्य,
जीवित हो उठेंगी तुम्हारे सामने इन जगहों पर
हमारी निष्पाप अस्थियाँ
कहेंगी तुमसे
बहाओ हमें कश्मीर ले जाकर
वितस्ता में

उस वक़्त खुल जाएंगी तुम्हारी आँखें
जैसे खुलते हैं गूढ़ शब्दों के अर्थ कभी
अपने आप
इन जगहों पर
कुछ मायूस घास उगी होगी
एक दूर छूटी याद में सरोबार

आस / अग्निशेखर

आस / अग्निशेखर
आस / अग्निशेखर

बूढ़ा बिस्तर पर लेटे
आँखों-आँखों नापता है आकाश

फटे हुए तम्बू के सुराख़ों से
उसकी झुर्रियों में गिर रही है
                       समय की राख

चुपचाप घूम रही है
सिरहाने के पास
घड़ी की सुई

उसकी बीत रही है
घर लौटने की आस

एक पाकिस्तानी दोस्त का आना-1 / अग्निशेखर

एक पाकिस्तानी दोस्त का आना-1 / अग्निशेखर
एक पाकिस्तानी दोस्त का आना-1 / अग्निशेखर

जीवन में एक बार
उसे जम्मू आकर तैरना है तवी में
यहाँ देश बटवारे से पहले
तेरा करते थे अब्बा
वह आ रहा है पकिस्तान से यहाँ
तवी के घाट पर
जैसे शरणार्थी - कैंप में मरे पिता की
अस्थियाँ लेकर गया था मै कश्मीर
मन ही मन
जहाँ बहती है मेरे पुरखों की नदी

वह आ रहा है अपने अब्बा की यादों के रास्ते
मलका पुखराज के मर्म तक
जिसकी आवाज़ से होता था
तवी में कम्पन
झूम उठते उसके आशिक
होतीं चिमेगोइयाँ
लगते ठहाके तवी के घात पर

मेरे दोस्त को उम्मीद है
उसे मिलेंगे तवी के पानी में
अब्बा के अक्स
जैसे मेरा बच्चा देखना चाहता है
कश्मीर जाकर

मेरे गाँव का स्कूल
जहाँ पड़ता था मैं
और पेड़ों पेड़ों करता उछलकूद
तोड़ता चोरी से वर्जित फल
मेरे गाँव का स्कूल
जहाँ पड़ता था मैं
और पेड़ों पेड़ों करता उछलकूद
तोड़ता चोरी से वर्जित फल

खुशकिस्मत हो दोस्त
तुम आ सकते हो पाकिस्तान से तवी के पास
और मै लौट नही सकता कश्मीर

एक पाकिस्तानी दोस्त का आना-2 / अग्निशेखर

एक पाकिस्तानी दोस्त का आना-2 / अग्निशेखर
एक पाकिस्तानी दोस्त का आना-2 / अग्निशेखर

तवी में तैरने के लिए
तुम सीख रहे हो तैराकी
सुनो अली अदालती,
मेरे शरणार्थी कैम्प से एक दिन
गायब हुई
एक जवान लड़की

वह पहुंची थी
निबिड़ और घने अंधेरो को पार कर
बारूद भरी घटी में अपने गाँव
और कूद पड़ी कपड़ों सहित
मछलियों से भरे सूर्यकुण्ड के हरे
रेशमी जल में

तैर कर गई कुण्ड के बीचोबीच
अपने इष्ट के पास
चढ़ाया बरसो बाद नाम आँखों से जल

रो पड़ी सूर्यकुण्ड की
असंख्य मछलियाँ उसे देख
सिसकियाँ भरी
बुजुर्ग चिनारों ने
पर्वतो ने बहाए बर्फ के आंसू
आकाश से उतरे पेड़ों पर
हजारो पंछी
गोया किन्नर हों
गन्धर्व हों
वह तैरती रही
सूर्यकुंड में
स्मृति में
स्वप्न में
नींद में
उसे पहचाना हवाओ ने
मिटटी की सोंधी गंध ने
वह तैरती रही
त्रासद उल्लास में
जैसे तैर रही हो अंतिम बार

उसके आगे पीछे
पानी की दुनिया में फैल गई
मछलियाँ ...
यह रक्षा कवच उनका !

वह तैरती रही आपे से बाहर होकर
और भाग आई
रातों रात वापस निर्वासन में

वह आज तक हैरान है
उसे जल में तैरना कैसे आया.

एक फ़िल्मी कवि से / अग्निशेखर

एक फ़िल्मी कवि से / अग्निशेखर
एक फ़िल्मी कवि से / अग्निशेखर

देखो, कुछ देर के लिए
सोने दो मेरे रिसते घावों को
अभी-अभी आई है
मेरे प्रश्नों को नींद

मुझे मत कहो गुलाब
एक बिसरी याद हूँ
जाग जाऊँगा

मुझे मत कहो गीत
सुलग जाऊँगा
बर्फ़ीले पहाड़ों पर
मुझे चाहिए दवा
कुछ ज़रूरी उत्तर
अपना-सा मौसम
थोड़ा-सा प्रतिशोध

मै दहक रहा हूँ
गए समय की पीठ
और आते दिनों के माथे पर
मुझे मत बेचो
गीत में सजाकर.

कबूतर सपना / अग्निशेखर

कबूतर सपना / अग्निशेखर
कबूतर सपना / अग्निशेखर

जलावतनी में
एक स्वप्न देखा मैंने
मेरे छूटे हुए घर के आँगन में
फिर से हरा हो गया है चिनार
और उसकी एक डाल पर
आ बैठी है
झक सफ़ेद कबूतरों की एक जोड़ी
मुझे देखती अनझिप

ये कबूतर
उतरना चाह रहे हैं मेरे कंधो पर
लगा मुझे ये आए हैं
स्वामी अमरनाथ की गुफा से उड़कर
मेरे उजड़े आँगन में

कि आज चिनार के नीचे
नए सिरे से घटित होती है
अमरकथा

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