असंगघोष की कविताएँ (174 रचनाएँ)

174 Hindi Poems of असंगघोष

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जात का भय / असंगघोष

जात का भय / असंगघोष
जात का भय / असंगघोष

साँय-साँय करती
सर्द हवाएँ
घटाघुप्प अंधकार
बियाबान जंगली रास्ता,
दोनों ओर नंग-धड़ंग
ऊँचे पहाड़ों पर फैला
खौफनाक सन्नाटा
जिसे रह-रह कर तोड़ती
सियार-झींगुरों की
तेज ककर्श आवाजें

इन सबसे
भयभीत हो
तुम
डरो मत!

गुफा में
पसरे अँधेरे को
साहस के चाकू से चीरते हुए
एक तेज चीख से
चमगादड़ों को भगाते
पगडंडी के रास्ते
उतर जाओ

हाँफो मत
धँसों गहराई तक
जब तक है दम
पूरी ताकत से धँसो

फिर निढाल हो
घबराए बगैर पड़े रहो
स्फूर्त होने तक
बार-बार उतरने
इस वर्ण व्यवस्था की
अँधेरी गुफा के अन्दर
जात के भय को
नेस्तनाबूद करने।

जाति जाती / असंग घोष

जाति जाती / असंग घोष
जाति जाती / असंग घोष

ओ जाति!
तू जाती क्या
बेड़ियाँ तोड़
बन्धन मुक्त कर
तू जाती क्या
ओ जाति!
मत बहरी बन
अबे ओ जाति
तू जाती क्या
बामन के घर
उसकी मेहरारू से पूछने
तेरा जनेऊ हुआ क्या?

जाति जाती / असंगघोष

जाति जाती / असंगघोष
जाति जाती / असंगघोष

ओ जाति!
तू जाती क्या
बेड़ियाँ तोड़
बंधन मुक्त कर
तू जाती क्या
ओ जाति!
मत बहरी वन
अबे ओ जाति
तू जाती क्या
बामन के घर
उसकी महरारू से पूछने
तेरा जनेऊ हुआ क्या?

ढकोसला / असंगघोष

ढकोसला / असंगघोष
ढकोसला / असंगघोष

तूने कहा
गंगा में नहाने से,
नर्मदा के दर्शन मात्र से
सारे पाप धुल जाते हैं
और इसी के सहारे
तू सारे कुकर्म करता रहा,
हर बार आड़ लेकर इनकी
हम पर वार करता रहा।

अब हम पहचान चुके हैं
तेरे कुकर्मों की इन सारी ढालों को
बता
इन नदियों के किनारे,
ये मेंढक क्यों टर्रा रहे हैं
पनेले साँप क्यों तैर रहे हैं इनमें
कछुएँ लम्बी उम्र क्यों जीते हैं
मछलियाँ मोक्ष क्यों नहीं पा जातीं
या
यह सब तेरी
तथाकथित शास्त्रगत
कोरी बातें हैं।

तेरी ही तरह
तेरी बातें भी ढकोसला हैं।

तथागत तुम क्यों मुस्कराए? / असंगघोष

तथागत तुम क्यों मुस्कराए? / असंगघोष
तथागत तुम क्यों मुस्कराए? / असंगघोष

ओ! गांधारकला की मूर्तियो
तुम्हारे वजूद पर
सब तरफ
अब हमले होने लगे हैं
बामियान का बुद्ध
आग के गोलों की मार से
खण्ड-खण्ड हो
बिखर गया है

यह देख
मेरा लहू खौलता है
तथागत!
जिसे देखकर भी
तुम चुप हो?
तुम्हारी अहिंसा
करुणा फिर दाँव पर है
और तुम हो
कि मुस्करा रहे हो
भंते!
गांधार के बाद मथुरा
मथुरा के बाद अमरावती
और अमरावती के बाद?
पोखरण!
पोखरण के काँपते ही
तुम्हारी मुस्कराहट के साथ
खत्म होती जाएँगी
तुम्हारी शिक्षाएँ ओ’ सभ्यता?

मेरी मानो
भंते!
तुम अब बार-बार
मुस्कराना छोड़ दो
तुम्हारे पीछे
एक अकेला मैं ही नहीं
पूरा समुदाय है
वादा करो
अब इस तरह नहीं मुस्कराओगे!

तनिक पूछो सुलोचना / असंगघोष

तनिक पूछो सुलोचना / असंगघोष
तनिक पूछो सुलोचना / असंगघोष

ओ शोकरत सुलोचना!
मत करो इतना विलाप
धीरज धरो
अविरल बहते आँसू पोंछ
पूछो, अहिल्या उद्धारक
मर्यादा पुरुषोत्तम
स्त्रियों को आदर देने वाले
एक पत्निव्रता?
तथाकथित भगवान से

आखिर क्या था
तुम्हारा अपराध
जो उसने अपने ही हाथों
तुम्हें वैधव्य की सजा दी

शायद
तुम्हारे क्रन्दन से ही
डरकर उसने
सरयू में कूद
आत्महत्या की हो
इससे पहले
कि उसकी आत्मा
यदि कोई मोक्ष हो तो,
पाए
तुम पूछो उससे अपना अपराध

हम भी जानना चाहे हैं
तुम्हारा अपराध।

तब तक / असंगघोष

तब तक / असंगघोष
तब तक / असंगघोष

रख दो
चूल्हे पर
उबलने पानी

इससे पहले
कि वह खौलने लगे
मैं ले आऊँगा लट्ठ
नुक्कड़ वाले थावरा से
तब तक
निगाह रखना
दरार में छिपे
इस साँप पर

खौलता पानी
गिरते ही
दरार से निकल
भागेगा यह
उसी समय
मैं करूँगा
इसका काम तमाम।

तीन गुल्ली / असंगघोष

तीन गुल्ली / असंगघोष
तीन गुल्ली / असंगघोष

इस चौक में
कभी रही होंगी
तीन गुल्लियाँ
तभी तो
यह कहलाता
तीन गुल्ली
अब एक भी गुल्ली
दिखाई नहीं देती
यह गुल्ली हैक्या
कोई नहीं जानता
बस तीन गुल्ली है
तीन गुल्ली माने
सागर तरफ जाने का
रोड मिलता है जहाँ
वही जगह है
तीन गुल्ली,
लेकिन एक भी गुल्ली वहाँ
कभी दिखाई नहीं देती
जात-पांत की तरह
यह भी छिप गई है कहीं
या काट ली गई होगी
कालान्तर में महुआ पीते-पीते
पर अब कौन जानता है
गुल्ली को
उसके नाम को
उसके परिणाम को
इसी चौराहे के पास खुले ठेके पर
महुआ भी सरकार ही बेच रही है
फिर भी चौराहे का नाम तीन गुल्ली ही है
वहाँ नहीं है अब कोई पेड़ गुल्ली का
हाँ एक तरफ किनारे पर
बूढ़ा पीपल जरूर खड़ा है
जिसके नीचे बैठता था मोचीराम
करने जूतों की सिलाई
फिर क्यों कोई
इसका नाम बदल कर
पीपल या बोधि-चौक नहीं रख देता,
कहने को यहाँ सियाराम है
राधेश्याम-सियाराम है
जो बनाते हैं दूध का हलुआ
हाथोहाथ बिक जाता है यह हलुआ
बताओ दूध का भी हलुआ बनता है
हाँ!
यहाँ कहते तो सभी यही हैं
ज्यादा कुरेदो तो कहने लगते हैं
हलुआ मतलब कलाकंद
तब भी चौक का नाम
सियाराम राधेश्याम चौक नहीं
कलाकंद चौक नहीं
हलुआ चौक नहीं
बोधिवृक्ष चौक भी नहीं
मोचीराम के नाम पर तो हर्गिज नहीं
बस ‘तीन गुल्ली’ है
खामख्वाह
मैं भी मरा जा रहा हूँ
इसके नाम पर
कोई अमर नेता तो मरे
तब ही रख देंगे
तीन गुल्ली की जगह
उस नेता का नाम।

तुझे रौंदूँगा / असंगघोष

तुझे रौंदूँगा / असंगघोष
तुझे रौंदूँगा / असंगघोष

मैंने झाँका
तेरे समाज के आइने में
वहाँ मेरा अक्श
मौजूद नहीं था
तेरी कुदृष्टि की मार से
आइना खण्ड-खण्ड विखण्डित हो
यत्र-तत्र फैला हुआ
दिखा

तूने बताया
एक बड़े टुकड़े के सामने
मेरा अक्श
मैं और तू
दोनों ही खड़े थे जहाँ

मैंने जानना चाहा तुझसे
तेरा बताया मेरा अक्श
किरचों-किरचों बिखरा
कटा-फटा धुँधलाया हुआ
क्यों है?
तू मौन रहा
अब भी मौन ओढ़े है, पर
तेरी आँख व हाथ का
इशारा बता रहा है
मेरा अक्श
तेरे निष्ठुर समाज में
धुँधलाया हुआ क्यों है
ठीक तेरे पाँवों के नीचे
इस तरह
तू सदियों से
मेरा जन्म अपने पाँवों से बता
मुझे रौंदता आया

अब समझ गया हूँ
तेरी करतूत
अब तू तैयार रह
मैं रौंदूँगा
तुझे अब अपने पैरों तले।

तुम देखना काल! / असंगघोष

तुम देखना काल! / असंगघोष
तुम देखना काल! / असंगघोष

एक

काल!
मेरी तुमसे
कोई होड़ नहीं है
जिन्हें थी
तुमसे होड़
वे जा चुके
अनन्त में समाने।

दो

काल!
तुम घूरते रहो
मुझे
मेरे पास है ही क्या
जिसे तुम उखाड़ लोगे।

तीन

काल!
तुम देखते रहे
हम पर ढाए गए
हर जुल्म और अत्याचार
फिर भी तुम रुके नहीं
हमारा हाल पूछने।

चार

काल!
यह तुम्हीं हो
जिसने मुझे कालान्तर से
इन आतताइयों का सामना
करने की शक्ति दी है
मुझे विद्रोह का स्वर दिया है
तुम्हीं ने काल।

पाँच

काल!
मेरी हथेली की
रेखाओं पर
अपनी जड़ें जमाए
इस कैक्टस में भी
एक दिन
फूल आएँगे उन्हें
जरूर
देखना तुम
काल
फूलों को चुन कर
जब काँटे निकाल फेंकूँगा बाहर
तुम जरूर देखना काल!

तुम देर से क्यों मरे? / असंगघोष

तुम देर से क्यों मरे? / असंगघोष
तुम देर से क्यों मरे? / असंगघोष

क्या वहाँ सिर्फ
तुम तीन ही थे
तुम, वल्चर और वह अनाम सुडानी बच्चा
क्या भगवान भी था
अगर था भी
तो कैसा था
गूंगा बहरा
या फिर अंधा
जो फोटो खींचकर
उसने तुम्हें भागने दिया
उसके बाद भी
तुम तीन माह तक
अवसाद में ही सही
जिन्दा कैसे रहे केबिन[1]
तुम्हें तो
फ्लेश चमकते ही
गिद्ध
का निवाला बनने
वहीं मर जाना था।

तुम भी! / असंगघोष

तुम भी! / असंगघोष
तुम भी! / असंगघोष

वर्णवादियों के अहकार तले
बेगार करता
सदियों से
एक अधूरा जीवन जी रहा

कहीं भी
भाग जाने को जी चाहता है

घरभर को गिरवी रख
हवेली में बेगार करता है
बेकाबू,
मन ही तो है
जातिवादी मकड़जाल को तोड़
मुक्त हो जाना चाहता है

जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
न मेरा कोई खेत है
न खलिहान
न कोई मुझे दाड़की देता है
न दिहाड़ी
न मेरे पास पूँजी
न कोई रोजगार
दो टुकड़ा रोटी के लिए
बिका
अपना श्रम ही नहीं-
बचा मेरे पास
कहाँ जाऊँ?

जानता हूँ
सिर्फ जूता बनाना
पॉलिश करना

जूता मल्टीनेशनल बना रहा है
मुझसे कौन बनवाएगा?

लोग खुदबखुद
अपने हाथों
बिना अपनी जात छोटी किए,
घरों में करने लगे हैं
जूता पॉलिश

मेरी जात
वहीं की वहीं है
साली चमार जात!
समय के साथ
न बदलती है,
न छूटती है,
तुम ही
अनवरत साक्षी हो
इस शूद्रता के
बेगारी के
गुलामी के
चौथा वर्ण बनाने के
उतावले,
अहंकार को पुख्ता करते हुए
सहभागी हो
साथ खड़े हो
उनके।

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