व्योमेश शुक्ल की कविताएँ (4 रचनाएँ)

4 Hindi Poems of व्योमेश शुक्ल

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जस्ट टियर्स / व्योमेश शुक्ल

जस्ट टियर्स / व्योमेश शुक्ल
जस्ट टियर्स / व्योमेश शुक्ल

[ इस लम्बी कविता में दर्ज़ लोग और भूगोल, दर्द और दिक्क़तें नई नहीं हैं, नया है वह कहन, जिसे व्योमेश शुक्ल अपनी कविताओं में मुमकिन करते रहे हैं । आत्मधन्य निज और नकली प्रतिकार की बजाय यहाँ ख़ुद अपनी और परिवेश की बेधक पहचान है, उसमें बहाल, बुलंद और बर्बर होती जा रही चीज़ों, लोगों और घटनाओं को उनके सही नाम से पुकारने का साहस और विवेक है। कई आईने हैं, कई अक्स । ]

भीड़ बढ़ी तक़लीफ़ें बढ़ीं मामा की दवा की दुकान में आकर लोग दवाई माँगने लगे. कुछ लोग सिर्फ़ फुटकर करवाने आते थे जिनसे कहना होता था कि ‘नहीं’. कुछ लोग कुछ लोगों का पता पूछने आते थे जिनसे कहना होता था ‘उधर से उधर से उधर’.

ज़िला अस्पताल के बाहर एक पेड़ था और मरीज़ को उसका नाम नहीं मालूम था. वसंत में उसका यौवन और उसकी खिली हुई आपत्तियां नहीं मालूम थीं. उसे अपनी बीमारी का नाम नहीं मालूम था. उसे अपने गाँव का नाम मालूम था. एक दिन एक लड़की ने मुझसे पूछा कि तुमने अस्पताल के बाहर वाले पेड़ का अजीब देखा है तो मैंने कहा कि हाँ. यह देखने का साझा था. मैं उस पेड़ को हिमाक़त या व्यस्त सड़क पर अतिक्रमण मानना चाहता था लेकिन लड़की के सवाल के बाद कुछ दिनों के लिए मैंने यह मानना चाहना टाल दिया.

लुब्रिकेशन कम हो गया था. हर चीज़ दूसरी चीज़ से रगड़ खा रही थी. माँ के घुटनों की तरह. हर पहले और हर दूसरे के बीच तीसरे तत्व का अभाव था. पलक झपकाने में भी बड़ा घर्षण था. लोग एकटक देखते रह जाते थे. यह देखने की मजबूरी थी. आँखों की बीमारी. कुछ लोगों को लगता था कि इसका इलाज हो सकता है. अब आँखों और पलकों के बीच की चीज़ गायब थी तो रोना मुश्किल हो गया. लोग रोने के लिए घबरा गए. बांधों, घड़ियालों और दलालों को भी दिक्कत हो गई. डॉक्टर पेड़ के अजीब के पड़ोस में बैठकर लुब्रिकेशन की दवा लिखने लगे. दवाई का नाम था जस्ट टियर्स.

मैं बहुत खुश होकर रोने की दवाई बेचने लगा.

जस्ट टियर्स. यह जस्ट फिट का कुछ लगता था. फूफा के लड़के का दोस्त टाइप कुछ. जस्ट फिट और जस्ट टियर्स के बीच कुछ था जो हर पहले और हर दूसरे के बीच के तीसरे तत्व की तरह आजकल नहीं था जैसे जस्ट फिट नाम की दुकान के ऊपर रहने वाले इंसान और जस्ट टियर्स नाम की दवाई बेचने वाले इंसान के बीच कुछ था जो आजकल नहीं था.


रोना लुब्रिकेशन की कमी दूर कर देता. मैं रोना चाहने लगा. बाँधों, घड़ियालों और दलालों की तरह. मैं बाँध होना चाहने लगा. भाखड़ा नांगल, हीराकुंड या रिहंद. मैं नेहरू के ज़माने का नवजात बाँध होता तो राष्ट्र की संपत्ति होता. मेरे बनने में सबकी दिलचस्पी होती. पन्द्रह दिन पर पंत जी और महीना पूरा होने पर पंडित जी मेरा जायज़ा लेने आते. मैं बहुत-से लोगों को विस्थापित कर देता और बहुत-सी मछलियों को संस्थापित लेकिन विस्थापितों के लिए रोने में मुझे जस्ट टियर्स की ज़रूरत न पड़ती. लुब्रिकेशन खत्म न हो गया होता. मेरे और विस्थापितों के बीच कुछ न कुछ होता. मेरे भीतर बहुत-सा पानी होता और बहुत-सी बिजली और बहुत-सी नौक़री और बहुत-से फाटक और बहुत-सी कर्मठता और और बहुत-सी ट्रेड यूनियनें और बहुत-सी हड़ताल और और बहुत-सी गिरफ़्तारी और बहुत-सी नाफरमानी.

मैं कहना न मानता. अन्धकार और दारिद्र्य में मैं पीले रंग का बल्ब बनकर जलता. मुझे बचाने और बढ़ाने की कोशिशें होतीं. मेरा भी दाम्पत्य होता और वसंत पंचमी होती मेरी शादी की सालगिरह. मैं मिठाई बाँटता और पगले कवि की तरह कहता कि मेरा जन्मदिन भी आज ही है. पेड़ के अजीब के साथ मेरा बराबरी का रिश्ता होता. मैं उसके कान में फुसफुसाता : ‘फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन...मफैलुन, मफैलुन...’. मेरे पेट में गाद न जमा होती. मुश्किल में मेरे दरवाज़े कभी भी खुल सकते होते. बिना घूस लिए उत्तर प्रदेश जल निगम जारी करता मेरे स्वास्थ्य का प्रमाण-पत्र. मैं बार-बार खाली होता और बार-बार भरा जाता. मुझसे कमाई होती और कुछ लोग मुझे आधुनिक भारत का मंदिर बताते. मैं सपाइयों-बसपाइयों के हत्थे न चढ़ा होता.

मैं सिद्धांत होता और कुछ देर के लिए ही सही, मैं बहस के एजेंडे को पलट देता. फिर सारी बातचीत पानी पर होने लगती. नागरी प्रचारिणी सभा की तरह मेरा पटाक्षेप न हो गया होता. नेशनल हेराल्ड की तरह, मैं धीरे-धीरे खत्म होता और कुछ कम भ्रष्ट लोग ही मेरे आसपास नज़र आ पाते. मेरे विनाश के अकल्पनीय नतीजे होते. मैं कुत्ते की मौत न मरा होता. मेरे उद्धार की कोशिशें होतीं और अंततः मैं एक प्रहसन बन गया होता. मैं बीमार हो पाता मेरे भी आँसू खत्म हुए होते मुझे भी जस्ट टियर्स की ज़रूरत होती.

 मैं बाँध नहीं हो पाया मेरी चिता पर मेले नहीं लगे मैं दवा की दुकान पर बैठने लगा तो मैं पेड़ के अजीब को हिमाक़त या व्यस्त सड़क पर अतिक्रमण मानने ही वाला था कि एक लड़की ने मुझसे पूछा कि हर पीछे आगे होता है और हर आगे पीछे होता है न ? तो मैंने जवाब देने की बजाय सोचा कि जीवन कितना विनोदकुमार शुक्ल है फिर मैंने सोचा कि विनोदकुमार शुक्ल जा रहे होते तो यह कहने की जगह कि जा रहा हूँ, कहते कि आ रहा हूँ फिर मैंने सोचा कि अगर संभव हुआ तो मैं विनोदकुमार शुक्ल से वाक्यविन्यास से ज़्यादा कुछ सीखूंगा फिर मैं आगे चला गया फिर मैंने पाया कि जीवन कितना कम विनोदकुमार शुक्ल है.
 
लुब्रिकेशन विनोदकुमार शुक्ल की तरह कम हो गया था. हर चीज़ दूसरी चीज़ से रगड़ खा रही थी. जर्जर पांडुलिपियाँ एकदूसरे से रगड़ खाकर टूट रही थीं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ की पांडुलिपियों का बंटाधार हो गया. भारतेंदु की ‘कवितावर्धिनी सभा’और ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ की फ़ाइलें पहले ही ठिकाने लग गई थीं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल-संपादित ‘हिंदी शब्द सागर’ को ‘सभा’ के ठेकेदारों ने गैरकानूनी तरीक़े से, पैसा लेकर ‘डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन’, युनाइटेड स्टेट्स की ‘साउथ एशियन डिक्शनरीज़’ नाम की वेबसाइट को बेच दिया है. यानी, अब वह शब्दसागर बनारस में नहीं है अमेरिका में है. लेकिन जैसा कि अमेरिकीकरण के हर आयाम के बारे में सच है, उसमें कुछ न कुछ मज़ा ज़रूर होता है, वह शब्दसागर भी इन्टरनेट पर लगभग मुफ़्त देखा जा सकता है. ठीक है कि पिछले पचास सालों में यह डिक्शनरी एक बार भी अपडेट नहीं हुई है, होगी भी नहीं, लेकिन अब, कम-से-कम देखी तो जा सकती है. एक मज़ा और भी है. इस बार पहले और दूसरे के बीच तीसरा तत्व है. हमारे और शब्दसागर के बीच अमेरिका है. और क्या तो लुब्रिकेशन है.


मैं पेड़ के अजीब को हिमाक़त या व्यस्त सड़क पर अतिक्रमण मानने ही वाला था कि एक लड़की ने मुझसे पूछा कि पब्लिक सेक्टर क्या होता है तो मुझे लगा कि यह खंडहर में जाने की तैयारी है. मैंने लड़की से कहा कि कल बताऊंगा. फिर मैं एक उजाड़ विषय का अध्यापक होना चाहने लगा. पेड़ के अजीब, बाँध और शब्दसागर की तरह मैं पब्लिक सेक्टर होना चाहने लगा. पब्लिक सेक्टर बनने के बाद ज़ोरज़ोर से बोलना पड़ता, फिर भी लोग सुन न पाते तो मैं और ज़ोर से बोलने की तैयारी करने लगा. यह तेज़ आवाज़ में अप्रिय बातें कहने का रिहर्सल था. फिर लड़की ने पूछा कि पहले सरकार ब्रेड क्यों बनाती थी और होटल क्यों चलाती थी तो मन हुआ कि कह दूँ कि अरुण शौरी उन्हें दलाली लेकर बेच सकें इसलिए, लेकिन तभी यह ख़याल आया कि सरकारी ब्रेड की मिठास लुब्रिकेशन की तरह खत्म है तो मैंने बुलंद आवाज़ में कहना शुरू किया कि तब तीसरी दुनिया के किसी भी देश में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सम्मेलन करने लायक कांफ्रेंस हॉल और शामिल देशों के प्रमुखों को टिकाने की जगह नहीं थी. आईटीडीसी का दिल्ली वाला होटल इसीलिए बना था. फिर यह जानते हुए कि कितना भी तेज़ बोलूँ, यह बात किसी को सुनाई नहीं देगी, मैंने कहना शुरू किया कि प्रतिकार के लिए कभी-कभी पाँच सितारा होटल भी बनाना पड़ता है. फिर मैंने पेड़ के अजीब की तरह कहा कि प्रतिकार भी करें हम रचना भी करें और बाँध की तरह कहा कि हमारी रचना हमारा प्रतिकार और शब्द सागर की तरह कहा कि प्रतिकार रचना होता ही है.

 लुब्रिकेशन प्रतिकार की तरह कम हो गया था. मैं प्रतिकार की सही दिशा और उसका ठीक समय होना चाहने लगा. मैं प्रतिकार पढ़ना चाहने लगा तो मेरे अध्यापक ने मुझसे कहा कि पहले तुम्हें नकली प्रतिकार से चिढ़ना सीखना होगा. उन्होंने खाँसते-खाँसते कहा कि जिस बात से लोकतंत्र में तुम्हारा भरोसा कम होता हो वह अराजनीतिक बात है फिर उन्होंने कहा कि सारी बातें राजनीतिक बातें होनी चाहिए फिर उन्होंने कहा कि आंदोलन अगर लोकतंत्र को मज़बूत नहीं बनाता तो वह व्यक्तिवाद और पाखंड है फिर उन्होंने कहा कि अत्याचारी का कहना मत मानो.
 
मैं घूमने चला गया तो जो आदमी घूमने की जगह के बाहर संतरी बनकर खड़ा था उसने पूछा कि तुम किस नदी के हो. मैंने कहा कि मैं एक परिवार एक गाँव एक कस्बे एक शहर एक राज्य का हूँ और यह पहली बार तुमसे पता चला कि मुझे किसी नदी का भी होना चाहिए उसने कहा कि तुम किसी-न-किसी नदी के होते ही हो क्योंकि हरेक किसी-न-किसी नदी का होता है. हमलोग किसी-न-किसी नदी के होते हैं और यह हमें कभी पता होता है कभी नहीं पता होता. उसने आगे कहा कि यह न जानना कि हम किस नदी के हैं, नदी की हत्या करना है. मैंने कहना चाहा कि नदियाँ लुब्रिकेशन की तरह कम हो गई हैं लेकिन संतरी से डर गया.

तब से मैंने कुछ नहीं कहा है.

बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं / व्योमेश शुक्ल

बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं / व्योमेश शुक्ल
बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं / व्योमेश शुक्ल

प्रणय कृष्ण के लिए

जगह का बयान उसी जगह तक पहुँचता है। वहीं रहने वाले समझ पाते हैं बयान उस जगह का जो उनकी अपनी जगह है।

अपनी जगह का बयान अपनी जगह तक पहुँचता है।

एक आदमी सुंदर आधुनिक विन्यास में एक खाली जगह में चकवड़ के पौधे उगा देता है तो रंगबिरंगी तितलियाँ उस जगह आने लगती हैं और उस आदमी को पहचान कर उसके कन्धों और सर पर इस तरह छा जाती हैं जैसे ऐसा हो ही न सकता हो। ऐसा नहीं हो सकता यह जगह के बाहर के लिए है और ऐसा हो सकता है यह जगह के लिए।

तितलियों के लिए तो ऐसा हो ही रहा है।

किस्सों-कहानियों में ख़तरनाक जानवर की तरह आने वाले एक जानवर के बारे में जगह के लोगों की राय है कि वह उतना ख़तरनाक नहीं है जितना बताया जाता है। जबकि जगह के बाहर वह उतना ही ख़तरनाक है जितना बताया जाता है।

जगह के भीतर का यह अतिपरिचित दृश्य है कि गर्मियों की शाम एक बंधी पर सौ साँप पानी पीने आते हैं। जगह में जब साँप पानी पी रहे होते हैं तो जगह के बाहर से देखने पर लगता है कि बंधी से सटाकर सौ डंडे रखे हुए हैं। जगह एक ऐसी जगह है जहाँ साँप को प्यास लगती है। जगह के बाहर न जाने क्या है कि साँप को प्यास नहीं लगती और वह डंडा हो जाता है। जगह के बाहर लोग डंडे जैसी दूसरी-तीसरी चीज़ों को साँप समझ कर डरते रहते हैं।

जगह के बाहर एक आदमी के कई हिजड़े दोस्त हैं। वे उससे पैसा नहीं मांगते, उसे तंग नहीं करते, उसे हिजड़ा भी नहीं मानते, फिर भी उसके दोस्त हैं। वे उससे कभी-कभी मिलते हैं लेकिन जब मिलते हैं दोस्त की तरह। जगह में लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, मुलाकात न हो पाने पर एक-दूसरे को याद करते हैं और एक-दूसरे के दोस्त होते हैं। जगह के बाहर मुलाकातें नहीं हो सकतीं। न दोस्त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है।

बूथ पर लड़ना / व्योमेश शुक्ल

बूथ पर लड़ना / व्योमेश शुक्ल
बूथ पर लड़ना / व्योमेश शुक्ल

पोलिंग बूथ पर कई चीज़ों का मतलब बिल्कुल साफ़
जैसे साम्प्रदायिकता माने कमल का फूल
और साम्प्रदायिकता-विरोध यानी संघी कैडेटों को फर्जी वोट डालने से रोकना
भाजपा का प्रत्याशी
सभी चुनाव कर्मचारियों
और दूसरी पार्टी के पोलिंग एजेंटों को भी, मान लीजिये कि आर्थिक विकास के तौर पर एक समृद्ध
नाश्ता कराता है
इस तरह बूथ का पूरा परिवेश आगामी अन्याय के प्रति भी कृतज्ञ
ऐसे में, प्रतिबद्धता के मायने हैं नाश्ता लेने से मना करना

हालाँकि कुछ खब्ती प्रतिबद्ध चुनाव पहले की सरगर्मी में
घर-घर पर्चियां बांटते हुए हाथ में वोटर लिस्ट लिए
संभावित फर्जी वोट तोड़ते हुए भी देखे जाते हैं
एक परफेक्ट होमवर्क करके आए हुए पहरुए
संदिग्ध नामों पर वोट डालने आए हुओं पर शक करते हैं

संसार के हर कोने में इन निर्भीकों की जान को खतरा है
इनसे चिढ़ते हैं दूसरी पार्टियों के लोग
अंततः अपनी पार्टी वाले भी इनसे चिढ़ने लगते हैं
ये पिछले कई चुनावों से यही काम कर रहे होते हैं
और आगामी चुनावों तक करते रहते हैं
ऐसे सभी प्रतिबद्ध बूढ़े होते हुए हैं
और इनका आने वाला वक्त खासा मुश्किल है

अब साम्प्रदायिक बीस-बीस के जत्थों में बूथ पर पहुँचने लगे हैं
और खुलेआम सैफुनिया सईदा फुन्नन मियाँ जुम्मन शेख अमीना और हामिद के नाम पर वोट डालते हैं
इन्हें मना करना कठिन समझाना असंभव रोकने पर पिटना तय

इनके चलने पर हमेशा धूल उड़ती है
ये हमेशा जवान होते हैं कुचलते हुए आते हैं
गालियाँ वाक्य विन्यास तय करती हैं चेहरे पर विजय की विकृति
सृष्टि में कहीं भी इनके होने के एहसास से प्रत्येक को डर लगता है

एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के अंतराल में
आजकल
फिर भी कुछ लोग इनसे लड़ने की तरकीबें सोच रहे हैं

मैं रहा तो था / व्योमेश शुक्ल

मैं रहा तो था / व्योमेश शुक्ल
मैं रहा तो था / व्योमेश शुक्ल

साफ़ झूठ

शिकायतें वक़्त से भी तेज़ गुज़र रही हैं ख़ुद को तुम्हारी मुस्कराहट से बदलती हुईं
उनकी फ़ेहरिस्त में कई शब्द आ गए हैं कई ग़ैर शब्द
आगामी शिकायतों का संगीत
उन्हें लिखना स्वरलिपियाँ लिखना

और कोई चुपके-चुपके लगा रहता है कि अपनी महान हिन्दी भाषा में कुछ वाक्य लिख ले

अरे महोदय, कितना पेट्रोल और पसीना बहता है ये सब करने में - उसका हिसाब लिखने में मन लगाओ, यही कर्त्तव्य है और तुम इसी के लायक़ भी हो। उनके कमरे में खिड़की खोलने से क्या फ़ायदा? अपने ख़त्म होते अनुभवों पर भरोसा रखो। ताकाझाँकी जैसी चालाकियाँ कुछ समय बाद शोभा देंगी। अभी तो तुम्हारे साफ़ झूठ में भी उसकी सच्ची हँसी की आहट है।

उस शहर की उस गली में

... कि तभी उस शहर की उस गली में उसके नाम का साइनबोर्ड दिखा। उस जैसा। बिलकुल उस जैसा और लगभग उस जैसा। उसके पसीने की बरसात में भीगा हुआ-सा। उसके चेहरे की धूप में चमकता हुआ-सा। उसको देखने-सा। उसके देखने-सा। उसकी चमक के ख़िलाफ़ धुँधला होता हुआ-सा। उसकी ज़बान जितनी ग़लत भाषा में लिखा हुआ। सबको दिखता हुआ-सा। हालाँकि देखने पर वहाँ सिर्फ़ ढाई अक्षर दिखाई देते हैं।

गुज़रना

इतनी बीहड़ क्रूरता के साथ बसे देश में सिर्फ़ तुम्हारे घर के नीचे, अफ़सोस, कभी ट्रैफ़िक जाम नहीं लगता जिसमें फँसा जा सके। वहाँ से ख़याल की तरह गुज़रना होता है।

दोनों एक ही बातें हैं

ऋतुओं के विहँसते सूर्य की तरह, दोपहर की झपकी की तरह, गर्भ की तरह, प्यास या ख़ास तुम्हारी शर्म की तरह, क्रूरतम अप्रैल में मई के आगमन की तरह

मैं रहा तो था

थकान की तरह मोज़ों के पसीने में तुम्हारे, वर्तनी की भूलों में, क्रियापदों के साथ लिंग के लड़खड़ाते रिश्ते में। तुम्हारी नाराज़गी में - ख़ुद को न देख पाता हुआ या सिर्फ़
ख़ुद को देखता हुआ या दोनों एक ही बाते हैं।

एक दिन

बृहस्पतिवार - तुम काजल लगा के नहीं आई थी। (उस दिन अपनी पेशी के दौरान नरेन्द्र मोदी ने कई झूठ बोले और कई धमकियाँ दीं।)

अब हो

आज मैंने मसलन बी.ए. पास कर लिया। आज मैं श्यामसुंदरदास बी.ए.। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में अपनी शिशुभाषा का पाठ्यक्रम बनाने वाला और एक भारी-भरकम बवालिया संस्था का निर्माता मैं आज। तीस साल का होने के तीन महीने पहले वह अगर ऐसे ही नाहक़ नाराज़ हो जैसे आज मुझसे हुई है तो तुम भी संस्थापक, प्रधानमंत्री या रूलिंग पार्टी के जनरल सेक्रेटरी हो सकते हो। ख़ैर, मेरी फ़िक्र न करो और आगे से मत डराओ। आगे तो तय है कि बहुत सा अपमान और उचाट है। बहुत सा पीछे है आगे। ख़ात्मा है आगे।

अब हो।

एक और दिन

शुक्रवार - फिर नहीं । ( आज सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस महानुभाव ने तमाम गुज़ारिशों के बावजूद मोदी के साथ मंच शेयर किया )

क्यों

इतने ग़ौर से क्यों सुनती हो तुम आँखों से क्यों सुनती हो?

या शायद

मैंने सोचा कि उनको या कहूंगा और सोचने लगूंगा कि इस चीज़ का नाम अब तक क्या रहा था और जानकर हैरान हो जाऊंगा कि जितनी आवाज़ें हैं उतने तो नाम हैं इसके और शायद इसे या भी बार-बार कहा गया होगा तो इसका एक नाम शायद भी हो सकता है और इसे कई बार कुछ नहीं कहा गया है तो इसका एक नाम कुछ नहीं या कुछ हो सकता है।

कुछ हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है। एक फूल खिल सकता है नाम देने के लिए। बहुत से फूलों के बीच एक फूल। दूसरे फूल दूसरों के नाम के लिये। ये फूल उन निगाहों का नाम हो सकता है।

कुछ भी हो सकता है कुछ नहीं भी हो सकता है। उनको देखने लिये उनकी ओर देखना पड़ सकता है और यह तो अक्सर होता है कि उनको देखने के लिए उनकी ओर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

यह उलझन दूर तक जा सकती है और यह उलझन बीच में ही ख़त्म हो सकती है ।

कुछ हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है

जब कुछ भी हो सकता है तो तुम भी कुछ भूल सकती हो। तुम जानबूझकर या भूल से भी भूल सकती हो काजल लगाना। यों उस महान क्रिया का जन्म होता है जिसका नाम है काजल लगाना भूलना।

चुप हो जाने के लिए

जब जीवन में बहुत से अंक हासिल करने का शोर मचा हुआ था, तुम उसमें कैसा तो अनाप-शनाप संगीत सुनने में लग गई, शोर के भीतर का संगीत, शोर की बेक़ाबू साँस का संगीत, शोर का उल्टा संगीत। तुम नहीं जानती कि ऐसे सुनने ने शोर को कितना नामुमकिन कर दिया है। सबसे ज़्यादा नुक़सान मेरा हुआ, मेरी शोर मचाती कविताओं का। उन्हें भी संगीत की तरह सुनोगी तुम, यह एहसास ही काफ़ी है चुप हो जाने के लिये।

धूप नहीं

धूप की कालीन बिछी थी और तुम्हारे उस पर से गुज़रने भर से वह सिर्फ़ धूप की कालीन नहीं रह गई। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के पन्नों पर एक साथ उगे दो सूर्य सिर्फ़ पन्नों पर नहीं उगे थे। मैंने देखा उस सूर्य को तुम्हारे चेहरे पर और तुम्हारे चेहरे के सूरज को वहाँ उगते हुए।

पार

देशभक्ति का कालजयी नाटक पढ़ते हुए हमारी आँखें मिलीं और तुम्हें पता ही नहीं। हद है। शब्दों और वाक्यों को आईने की तरह इस्तेमाल करते हुए मैंने उस चीज़ को देखा जिसे बोलचाल की भाषा में राष्ट्रप्रेम वगैरह कह दिया जाता है।

वे तुम्हारी आँखें थीं राष्ट्र के पार देखती हुईं। तुमको नहीं पता था तुम्हारी आँखों को पता था मेरी आँखों का। तुमको नहीं पता था तुम्हारी आँखों को पता था कि न देखते हुए कैसे देखा जाता है?

सपना

कलाई में दिल की धड़कन थी बायप्सी की रिपोर्ट में दाँत दर्द का अनुवाद कैंसर किया गया था नींद बहुत लम्बे-लम्बे वाक्यों में जागने का सपना थी सारी थकान एक बहुत चुस्त चालाकी में बदली हुई थी शरीर आत्मा पर फ़िदा हुआ जा रहा था सारे दुश्मन दोस्त हो गए थे सभी स्पर्शों की गिनती और सारे स्विच ऑफ़ मोबाइल फ़ोनों के नंबर याद हो गए थे जिस नदी को इस पार से उस पार तक सत्तर धोतियों से बाँधा जाता था वह अब दस धोतियों में पूरी हो जाती थी

हम ख़ुद से शर्माए जा रहे थे और आज इसका कितना शिद्दत से अफ़सोस था कि लोरी लिखना नहीं आता और एक ग़ैर निबंधात्मक प्रेमपत्र भी लिखना हुआ तो असलियत सामने आ जायेगी.

यहाँ

पीले पन्नों वाली किताब में छपी बच्चा कविता में से निकलकर आया था मामू मौसम के बिल्कुल पहले आम लेकर.
मामू सरकारी कर्मचारी है
वह आया तो सरकार आयी हमारी हैसियत भर की
और नींद में उसकी आवाज़ उसकी आवाज़ का सप्तक उसकी तक़लीफ़ उसका रिटायरमेंट उसकी पेंशन उसके लड़के का पैकेज
इन सभी मुद्दों पर अम्मा की हाँ-हूँ

मामू जगाता नहीं
और कौन जागना चाहता है इस छंदमय जगनींद से उस जागरण में

वहाँ सिर्फ़ तुम हो और तुम हो और तुम हो

और यहाँ भी

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