शमशेर बहादुर सिंह की कविताएँ (76 रचनाएँ)

76 Hindi Poems of शमशेर बहादुर सिंह

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'यामा' कवि से / शमशेर बहादुर सिंह

'यामा' कवि से / शमशेर बहादुर सिंह
'यामा' कवि से / शमशेर बहादुर सिंह

छू नहीं सकती
साँस जिसे
वर्ण गीत जिसे
किंतु मर्म।

नींद का संगीत
गाकर
विसुध खग।

जुगनुओं के सूर्य
अनगिन सूक्ष्मर
तुहिनकण की स्त्ब्ध रजनी में।

विशाल आह्वान
बहा आता लिये
एक गौरव-गान।

हृदय पर मधुमास के
टुकड़े
फूल के, बिखरे।

कुछ नहीं लाया
प्रेम,
अश्रु अश्रु अश्रु
पुन:
पुन:

कब न लजी मैं
किंतु आज
ओ प्रतीक्षे!

"आकाशे दामामा बाजे... / शमशेर बहादुर सिंह

"आकाशे दामामा बाजे... / शमशेर बहादुर सिंह

गर्दन झुकाए
एकटक कुछ देखते,सोचते,
निश्चय
        ओ विद्रोही
--क्या देखते, जाने क्या सोचते
स्वतः अनजाने ही
तीन देशों के एक साथ नागरिक
तीन देशों की विप्लवी
     एकता में
     कहीं
     चित्त बसाए
...हमारे लिए तीन
जो तुम्हारे लिए एक...
मौन शांत दृष्टि से
क्या अवलोकन करते
कौनसी कविता लिखते
किस नए कॉस्मिक विद्रोह और
                       निर्माण की !
"...आकाशे दामामा बाजे..."
     विद्रोही !
क्या अब भी दामामे बज रहे हैं
--और किस आकाश में
किन-किन धरतियों के ऊपर
     मानव-हृदयों में
               दामामे बज रहे हैं ?!
"चल ! चल ! चल !" शुन, शुन,
                            शुन !
वह शोकगीत के दामामे हैं शायद :
मगर उनकी चोट कैसी कड़ी है
           विद्रोही !
न, न, न,
वो शोकगीत के न होंगे,
विजय के ही होंगे निरन्तर
                     सदा की तरह !
क्यों तुम बोल न उठे
      यकायक कभी ?
इतना कुछ हो गया
      दुनिया में
हीरोशिमा नागासाकी ही नहीं
पूरा वियतनाम
पूरा चीन
पूरा अफ़्रीका
पूरी अरब दुनिया
--ये सब
मानव चेतना के इतिहास में
                    व्याप्त हो गया :
हम अपनी साँस में
इन सबको जीते हैं
...और तुम ?!
युद्ध समाप्त हुआ
जिसमें से और
       भीषणतर युद्ध
       आरम्भ हुए;
पश्चिम का दानवी रूप
       प्रकट हुआ;
तीसरी दुनिया ने जन्म लिया
       और आँखें खोलीं...!
यहूदियों अरबों ईसाइयों
की आने वाली क़यामत
अभी फट तो नहीं पड़ी है
इस धरती के सर पर,
मगर इसी विस्फोट के लिए
प्राण-पन से
अमरीका
निरंतर अहर्निश
घोर अभ्यास कर रहा है !
तुम्हें ख़बर नहीं ?
तुम अपने...
      अपने सुदूर
       विद्रोही अवचेतन में
कौन से महाकाव्य की

अज्ञेय से / शमशेर बहादुर सिंह

अज्ञेय से / शमशेर बहादुर सिंह
अज्ञेय से / शमशेर बहादुर सिंह

जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका ग़म क्या?
वह नहीं है ।

किससे लड़ना ?

रुचि तो है शांति,
स्थिरता,
काल-क्षण में
एक सौन्दर्य की
मौन अमरता ।
अस्थिर क्यों होना
फिर ?

जो है
उसे ही क्यों न संजोना ?
उसी के क्यों न होना ?-
जो कि है ।

जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका ग़म क्या ?
वह नहीं है ।


('प्रतिनिधि कविताएँ' नामक संग्रह से )

अन्तिम विनिमय / शमशेर बहादुर सिंह

अन्तिम विनिमय / शमशेर बहादुर सिंह
अन्तिम विनिमय / शमशेर बहादुर सिंह

हृदय का परिवार काँपा अकस्‍मात।
भावनाओं में हुआ भू-डोल-सा।
पूछता है मौन का एकान्त हाथ
वक्ष छू, यह प्रश्‍न कैसा गोल-सा :
प्रात-रव है दूर जो 'हरि बोल!' सा,
पार, सपना है - कि धारा है - कि रात?
कुहा में कुछ सर झुकाए, साथ-साथ,
जा रहा परछाइयों का गोल-सा!
         × ×
प्राण का है मृत्‍यु से कुछ मोल-सा;
सत्‍य की है एक बोली, एक बात।
[1945]

आओ! / शमशेर बहादुर सिंह

आओ! / शमशेर बहादुर सिंह
आओ! / शमशेर बहादुर सिंह

1
क्‍यों यह धुकधुकी, डर, -
      दर्द की गर्दिश यकायक साँस तूफान में गोया।
छिपी हुई हाय-हाय में
सुकून
     की तलाश।

                 बर्फ के गालों में है खोया हुआ
                       या ठंडे पसीने में खामोश है
                             शबाब।

तैरती आती है बहार
     पाल गिराए हुए
           भीने गुलाब - पीले गुलाब
                             के।
तैरती आती है बहार
       खाब के दरिया में
                   उफक से
             जहाँ मौत के रंगीन पहाड़
                         है।
जाफरान
       जो हवा में है मिला हुआ
                         साँस में भी है।
मुँद गयी पलकों में कोई सुबह
                 जिसे खून के आसार कहेंगे।
- खो दिया है मैंने तुम्‍हें।
 

2
कौन उधर है ये जिधर घाट की दीवार... है?
      वह जल में समाती हुई चली गयी है;
                  लहरों की बूँदों में
                        करोड़ों किरनों
                        की जिन्दगी
                  का नाटक-सा : वह
                        मैं तो नहीं हूँ।
 

फिर क्‍यों मुझे (अंगों में सिमिट कर अपने)
तुम भूल जाती हो
      पल में :
तुम कि हमेशा होगी
      मेरे साथ,
तुम भूल न जाओ मुझे इस तरह।
 

× ×
 

एक गीत मुझे याद है।
      हर रोम के नन्‍हें-से कली-मुख पर कल
      सिहरन की कहानी मैं था;
      हर जर्रे में चुम्‍बन के चमक की पहचान।
      पी जाता हूँ आँसू की कनी-सा वह पल।
 

ओ मेरी बहार!
            तू मुझको समझती है बहुत-बहुत - - तू जब
            यूँ ही मुझे बिसरा देती है।
 

खुश हूँ कि अकेला हूँ,
      कोई पास नहीं है -
      बजुज एक सुराही के,
      बजुज एक चटाई के,
      बजुज एक जरा-से आकाश के,
      जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर
      (बजुज उसके, जो तुम होतीं - मगर हो फिर भी
                  यहीं कहीं अजब तौर से।)
 

तुम आओ, गर आना है
मेरे दीदों की वीरानी बसाओ;
शे'र में ही तुमको समाना है अगर
जिन्दगी में आओ, मुजस्सिम...
बहरतौर चली आओ।
      यहाँ और नहीं कोई, कहीं भी,
      तुम्‍हीं होगी, अगर आओ;
      तुम्‍हीं होगी अगर आओ, बहरतौर चली आओ अगर।
      (मैं तो हूँ साये में बँधा-सा
      दामन में तुम्‍हारे ही कहीं, एक गिरह-सा
      साथ तुम्‍हारे।)
 

3
तुम आओ, तो खुद घर मेरा आ जाएगा
            इस कोनो-मकाँ में,
            तुम जिसकी हया हो,
            लय हो।
 

उस ऐन खमोशी की - हया-भरी
इन सिमतों की पहनाइयाँ मुझको
पहनाओ!
            तुम मुझको
इस अंदाज से अपनाओ
            जिसे दर्द की बेगानारवी कहें,
            बादल की हँसी कहें,
            जिसे कोयल की
            तूफान-भरी सदियों की
            चीखें,
            कि जिसे 'हम-तुम' कहें।
 

(वह गीत तुम्‍हें भी तो
याद होगा?)
 

[1949]

उत्तर / शमशेर बहादुर सिंह

उत्तर / शमशेर बहादुर सिंह
उत्तर / शमशेर बहादुर सिंह

बहुत अधिक, बहुत अधिक तुम्‍हें याद करता मैं रहा;
यह भी था कारण जो पत्र मैं लिख नहीं सका;
लिख नहीं सका, बस।
भावों का भार उन शब्‍दों से उठ नहीं सका,
लिखे-पढ़े जाते जो पत्रों में।
अन्‍य रूप शब्‍दों को देने का कौन अधिकार
आपके मेरे संबंध ने कभी मुझे दिया?
अतः विवश रहा, विवश रहा।
पढ़ लेते आप? यदि लिखता मैं
बार-बार-बार-बार- केवल वह एक नाम,
एक नाम, एक नाम ...
आह !

उषा / शमशेर बहादुर सिंह

उषा / शमशेर बहादुर सिंह
उषा / शमशेर बहादुर सिंह

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे

भोर का नभ

राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)

बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से
कि धुल गयी हो

स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
        मल दी हो किसी ने

नील जल में या किसी की
        गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो ।

और...
        जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।


(कविता-संग्रह, "टूटी हुई बिखरी हुई" से)

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता / शमशेर बहादुर सिंह

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता / शमशेर बहादुर सिंह
एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता / शमशेर बहादुर सिंह

एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है

कितनी ऊंची घासें चांद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ

फिर क्यों
दो बादलों के तार
उसे महज उलझा रहे हैं?

(1956 में रचित,'कुछ कवितायें' कविता-संग्रह से )

एक नीला आईना बेठोस / शमशेर बहादुर सिंह

एक नीला आईना बेठोस / शमशेर बहादुर सिंह
एक नीला आईना बेठोस / शमशेर बहादुर सिंह

एक नीला आईना
बेठोस-सी यह चाँदनी
और अंदर चल रहा हूँ मैं
उसी के महातल के मौन में ।
मौन में इतिहास का
कन किरन जीवित, एक, बस ।
एक पल की ओट में है कुल जहान ।
आत्मा है
अखिल की हठ-सी ।
चाँदनी में घुल गए हैं
बहुत-से तारे, बहुत कुछ
घुल गया हूँ मैं
बहुत कुछ अब ।
रह गया-सा एक सीधा बिंब
चल रहा है जो
शांत इंगित-सा
न जाने किधर ।

एक पत्राचार / शमशेर बहादुर सिंह

एक पत्राचार / शमशेर बहादुर सिंह
एक पत्राचार / शमशेर बहादुर सिंह

[प्रभाकर माचवे : शमशेर]

पहला पत्र: एक पद्यबद्ध चक्‍कर
(कार्ड)

बस के लिए राह देखते हुए:
नई दिल्‍ली : 17.08.53

"तुमने लिखा है पत्र मुझे गजलबंद कर?
मैं आज ही हुआ हूँ यहाँ से रिलीव, मगर
जाना है नागपुर को। पहुँच जाऊँगा उधर
छब्‍बीस तलक। और यूँ ही होते ट्रांसफर।
रेडियो की नौकरी ही है हवा पर सफर।
वहीं पत्र लिखो, मित्र। राम-राम
प्रेम से भरा सलाम लो कि -
प्रभाकर।"

दूसरा पत्र : जवाब का वह 'गजलबंद' चक्‍कर

जो चलता ही रहा और इस बीच हजरत माचवे नागपुर से
दिल्‍ली वापस भी आ गये : चुनांचे -

(पहला हिस्‍सा : प्रभाकर "नागपुरी" को)

दिल्‍ली वालों को ही हवा छोड़ के घर-भर अब तो
नागपुर आ ही गया होगा, प्रभाकर। अब तो
बँध गयी होगी हवा। होगे हवा पर अब तो!

दिल्‍ली बस-स्‍टैंड से ही कार्ड मिला था मुझको।
काश फिर लिखते - 'वही है जो गिला था मुझको1।'
ताकि हम कहते कि 'है जुल्‍म सरासर अब तो!'

घर में हो चाहे सफर में, यही कहते होगे...
फल्‍सफे में कि शेSर में: यही कहते होगे -
'जिंदगी है मेरी सरकार का दफ्तर अब तो!'

वाँ जमाने के सताये हुए दो और भी हैं।2
वही तेवर हैं जो थे, और वही तौर भी हैं।
मिल लिये होंगे मेरी याद दिलाकर अब तो।

[और फिर यह, प्रभाकर "दिल्‍लीवाल" को : ]

जिसकी बरकत ही न थी अपने करम में अब तक
तुम भरमते तो रहे उसके भरम में अब तक!
- चैन लेने दे कहीं आर्ट का चक्‍कर अब तो!

कहा मेहता ने : 'य सरकार है नौकर जिसकी,
अब तमन्‍ना है तो उसकी ही फकत सर्विस की!'
और यह कहके मेरा यार गया घर अब तो!

सच की सिल्ली है वही, और नयी है फिर भी :
नयी दिल्ली है वही और नयी है फिर भी !
हैं कसौटी पर नये और प्रभाकर अब तो !

क्‍या थे पहले ही जो अब और भी कम हों शमशेर !
हो 'गजलबंद' वो मजमून जो हम हों, शमशेर;
वर्ना खामोश पड़े रहना ही बेहतर अब तो!

एक धंदा है य उलफत भी कई धंदों में।
लिक्‍खा बंदे ने जवाब, और कई बंदों में।
पोस्‍ट गो करना न करना है बराबर अब तो!

एक पीली शाम / शमशेर बहादुर सिंह

एक पीली शाम / शमशेर बहादुर सिंह
एक पीली शाम / शमशेर बहादुर सिंह

एक पीली शाम
      पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता
शान्त
मेरी भावनाओं में तुम्‍हारा मुखकमल
कृश म्‍लान हारा-सा
     (कि मैं हूँ वह
मौन दर्पण में तुम्‍हारे कहीं?)

     वासना डूबी
     शिथिल पल में
     स्‍नेह काजल में
     लिये अद्भुत रूप-कोमलता

अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू
सान्‍ध्‍य तारक-सा
      अतल में।

[1953]

एक मुद्रा से / शमशेर बहादुर सिंह

एक मुद्रा से / शमशेर बहादुर सिंह
एक मुद्रा से / शमशेर बहादुर सिंह

- सुंदर !
उठाओ
निज वक्ष
और-कस-उभर!

क्यावरी
भरी गेंदा की
स्व र्णारक्तु
क्यागरी भरी गेंदा की:
तन पर
खिली सारी -
अति सुंदर! उठाओ...।

स्वप्न--जड़ित-मुद्रामयि
शिथिल करुण!
हरो मोह-ताप, समुद
स्म र-उर वर :
हरो मोह-ताप -
और और कस उभर!
सुंदर! उठाओ...!
अंकित कर विकाल हृदय-पंकज के अंकुर पर
चरण-चिह्न,
अंकित कर अंतर आरक्तओ स्नेेह से नव, कर पुष्ट, बढ़ूँ
सत्वतर, चिरयौवन वर, सुदंर! –

उठाओ निज वक्ष: और और कस, उभर!

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